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उठो, जागो और तब तक ना रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए (Utho jago aur tab tak mat ruko jab tak lakshy ki praapti na ho jae)

उठो, जागो और तब तक ना रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए (Utho jago aur tab tak mat ruko jab tak lakshy ki praapti na ho jae)

Utho jago aur tab tak mat ruko jab tak lakshy ki praapti na ho jae
Utho jago aur tab tak mat ruko jab tak lakshy ki praapti na ho jae

स्वामी विवेकानंद की अमूल्य धरोहरों में से एक कठोपनिषद् है जिसका एक सूत्रवाक्य बहुत ही प्रचलित है “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” अर्थात उठो, जागो और बोध प्राप्त करो। यह सूत्र इतना गूढ़ अर्थ वाला है कि इसे समझने के लिए अत्यंत गहराई से विचार करना जरूरी है, क्योंकि स्वामी विवेकानंद ने इस सूत्र का चुनाव यूं ही नहीं बल्कि काफी सोच विचार करके इस श्लोक में बड़ी अद्भुत बात कही है कि उठो और जागो।

सामान्यतः सोया हुआ व्यक्ति पहले जागता है फिर उठकर बैठता या खड़ा होता है। सोया हुआ व्यक्ति, जब तक नींद ना खुले यानी वह जागे नहीं तब तक उठ कैसे सकता है? पर सूत्र कहता हैं, उठो और जागो तो यहां स्वामी विवेकानंद के कहने का कुछ और ही तात्पर्य है। और वह यह है कि ये जिस जागने की बात कर रहें हैं वह शारीरिक नींद से जागने की बात नहीं है क्योंकि शारीरिक तल पर जागना तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जो सोता है वह जागता ही है, ना जगाया जाए तो भी खुद-ब-खुद जागता है। यहां तो स्वामी विवेकानंद जिस जागने की बात कह रहें हैं, वह शारीरिक जाग की नहीं, मानसिक जाग की बात है और उठ जाने के बाद जागना यानी होश में आना, विवेक पूर्वक जागना जिससे एक सतर्कता उपलब्ध होती है। सतर्कता यानी अवेयरनेस बराबर बनी रहे, एक बोध बना रहे और हम जो कुछ भी करे वह विवेकपूर्ण हो, हितकारी हो, सार्थक और सकारात्मक हो ताकि जीवन में कोई गलत काम न हो। जीवन की दिशा गलत न हो क्योंकि दिशा गलत होगी तो दशा भी गलत हो जाएगी, दुर्दशा हो जाएगी। उठने के बाद जाग जाने का यही तात्पर्य है।

कहना अतिशयोक्ति न होगा कि स्वामी विवेकानंद ने कठ उपनिषद् के इस सूत्र को इसलिए प्रस्तुत किया कि यह सूत्र हर काल में प्रासंगिक है, उपयोगी है और विश्व के प्रत्येक मानव के लिए कल्याणकारी है। इस सूत्र पर अमल किए बिना मानव सुखी व स्वस्थ जीवन कदापि जी नहीं सकता फिर चाहे वह ऐशो आराम और मौज मज़े के कितने ही साधन जुटा लें। वह भले ही उन्नति करता हुआ चंद्र और मंगल ग्रह तक जा पहुंचे पर ऐसे ही हालात रहे तो वहाँ से फिसलकर वह रसातल में जा गिरेगा इसमें कोई संदेह नहीं। यदि प्रगतिशीलता का विकास का दम भरने वाले तथाकथित विकसित स्थिति को प्राप्त करने का दावा करने वाले आज के मानव ने स्वामी विवेकानंद के सूत्र-संदेश पर 70 वर्ष पहले गुलामी से आजाद होते समय ही ध्यान दिया होता और इस पर अमल करना शुरू कर दिया होता तो आज हमारा देश ही नहीं पूरा विश्व ही स्वर्ग के समान बना हुआ होता, जबकि आज धीरे धीरे नरक जैसा होता जा रहा है।

यह सूत्र सबसे ज्यादा हमारी युवा पीढ़ी के लिए ध्यान देने योग्य है, अमल में लेने योग्य है क्योंकि कोई भी साहसपूर्ण, चुनौतीपूर्ण और क्रांतिकारी योजना पर अमल करने और सफल करने का दमखम और बलबूता युवा पीढ़ी में ही हो सकता है, नए खून और जवानी के जोश में हो सकता है। कई जिम्मेदारियों के बोझ से दबे हुए तथा दुनियादारी के प्रपंच में उलझे हुए हारे-थके, प्रौढ़ और वृद्धजनों से नहीं हो सकता, होता भी नहीं।

यह एक सुखद और आशा से भरा हुआ संयोग ही है कि भारत में जितनी भारी संख्या में युवा मौजूद हैं, उतनी संख्या में विश्व के किसी देश में नहीं है। अगर अभी भी देश के करोड़ों युवा स्वामी विवेकानंद के इस संदेश की गहराई और महत्ता को ठीक से समझकर इस पर अमल करने लगे तो वे बहुत जल्दी ‘मेरा भारत महान’ के नारे को वास्तविक रूप में सही सिद्ध कर सकते हैं। यह देश के लिए बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हमारी युवा पीढ़ी, दिन ब दिन पश्चात विचारधारा, आचार-विचार और सुविधा भोगी, मौज मज़ा करने वाली Eat, drink and be Merry वाली जीवनशैली को अपनाती जा रही है और श्रेष्ठ जीवन के मार्ग से पथ भ्रष्ट हो कर, जीवन को नष्ट-भ्रष्ट, अस्त-व्यस्त और रोगों के जंजाल में फंसाने वाले मार्ग पर चल रही है।

आज की युवा पीढ़ी को जैसी सुख-सुविधा के साधन उपलब्ध हैं उनको तो हमारे बाप-दादों ने सपनों में नहीं देखा होगा। जिस आयु में हमने भावी जीवन को स्वस्थ और समृद्ध बनाने वाले आहार-बिहार और आचरण का पालन करने का तप और पुरुषार्थ करना चाहिए उस आयु में बच्चे मौज-मजा करने और सारे सुख भोग लेने वाली जीवन शैली अपना रहे हैं। इन्हें इसका कोई ख्याल नहीं है कि उनका कल कैसा होगा और होना कैसा चाहिए। उनके देश का कल कैसा होगा और होना कैसा चाहिए? आज अगर वे बालक हैं तो कल उन्हें पालक भी तो बनना है, देश का एक जिम्मेदार और श्रेष्ठ नागरिक बनना है, तब क्या होगा? ये बच्चे आज यह समझ नहीं रहे हैं कि उनका कल आज में छिपा हुआ है और जो जैसे बीज वे आज बो रहे हैं वैसी ही फसल कल उन्हें ही काटनी होगी। ‘अवश्यमेवं भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।’ के अनुसार किये हुए अच्छे और बुरे कर्मों का फल हर हालत में अवश्य ही भोगना पड़ता है, इससे बचा नहीं जा सकता।

ऐसा सोच-विचार आज की पीढ़ी को करना ही होगा। हे देश के करोड़ों युवको ! स्वामी विवेकानंद के संदेश “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ” पर ध्यान दो ! इसे समझो और इस पर अमल करना शुरू करो ताकि आप अपना खुद का और साथ ही देश का भविष्य उज्ज्वल, प्रगतिशील तथा समृद्धिशाली बना सको। आज की सबसे पहली और जरूरी अवश्यकता यही है कि हमारी युवा पीढ़ी ही इस आवश्यकता की पूर्ति कर सकती है। उसे यह क्रांतिकारी कदम उठाना ही होगा वरना देश को विनाश से बचाना असंभव हो जाएगा। देश बचेगा तो हम बचेंगे, यह बात हर युवा को प्रतिफल ध्यान में रखनी होगी।

आज हर देशवासी का धर्म राष्ट्रधर्म होना चाहिए। हम सब मिलकर एक युवा पीढ़ी की इस क्रांति को समर्थन दें, सहयोग दें ताकि देश में एकता, अखंडता, परस्पर प्रेम व सद्भाव का वातावरण बन सके, सारा राष्ट्र एक परिवार की तरह रह सके, राष्ट्र मजबूत, खुशहाल और संपन्न बन सके। उत्तम आहार-विहार और श्रेष्ठ आचार-विचार और सदाचारी व्यवहार का पालन करते ही हम अपना, अपने परिवार का और पूरे देश का स्वास्थ्य और जीवन संवार सकते हैं। ‘महाजनों येन गत: स पन्था’ के अनुसार, जिस मार्ग पर श्रेष्ठ महापुरुष चले हैं वहीं मार्ग सही और अनुकरण करने योग्य है। युवा दिवस मनाने का यही सही तरीका और सदुपयोग है।

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Babita Singh
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