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क्रिसमस डे पर निबंध – Christmas Essay In Hindi

Essay on Christmas Day in Hindi for Class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 & 10 Students

Christmas Essay In Hindi - Nibandh
Christmas Essay In Hindi – Nibandh

प्रस्तावना – 

Christmas Essay In Hindi – ये तो सर्वविदित है कि भारत देश में कई धर्मों को मानने वाले लोग हैं। और इन सबके अपने कुछ पारंपरिक, ऐतिहासिक और धार्मिक त्योहार भी है, जिससे यहाँ वर्षभर किसी न किसी धर्म का कोई न कोई त्यौहार राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाया ही जाता रहता है। और जिनके पीछे एक समृद्ध संस्कृति तथा महात्म होता हैं। भारतीय पर्वों के इसी क्रम का एक बड़ा धार्मिक और महत्वपूर्ण पर्व क्रिसमस है।

‘क्रिसमस’ (Christmas Day) मूलतः ईसाई समुदाय का सबसे प्रमुख और प्रतीक्षित त्यौहार है। यह त्योहार हर साल 25 दिसंबर को मनाया जाता है। सामान्यत: हम लोग इसे क्रिसमस डे या बड़ा दिन भी कहते हैं। इस दिन को प्रभु यीशु मसीह के जन्म-दिन के रूप में मनाया जाता है। 

ईसा मसीह न सिर्फ ईसाई धर्म के प्रवर्तक थे बल्कि एक महान समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने जीवन काल में व्याप्त सामाजिक बुराइयों एवं धार्मिक आडंबरों का कड़ा विरोध किया तथा सत्य का मार्ग प्रशस्त करके भटकी हुई मानवता को नई दिशा दिखाई। इसलिए लाखों लोग उनके अनुयायी बन गये थे। लेकिन कुछ लोगों के मन में यीशु के प्रति घृणा और नफ़रत के भाव थे। इसी दुर्भावना से वशीभूत उन्होंने जीजस को सूली पर लटका दिया।

यद्यपि मानवता के इस पुजारी का बलिदान हो गया लेकिन उनका अध्यात्मिक जीवन, संदेश और आशीष वचन बाइबल आज भी लाखों युवा व प्रौढ़ में सामान रूप से प्रेरणा का स्रोत है। ईशा के सिद्धांत का प्रचार और प्रसार आज विश्व के अधिकांश देशों में बड़ी तेजी से हो रहा है। उनके अनुयायियों की संख्या सारे देश में बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है। 

ईसा मसीह का जन्म – 

ईसाई मान्यताओं के अनुसार आज से लगभग दो हजार साल पहले नासरत में गेब्रियल नामक एक स्वर्गदूत ने मानवीय गुणों से युक्त मरियम और युसुफ़ नामक दंपत्ति को दर्शन दिया और कहा कि आप पवित्र आत्मा की ओर से माँ बनेंगी और एक पुत्र को जन्म देंगी जिसका नाम यीशु रखा जाएगा।

इसके बाद ईश्वर की असीम कृपा से मरियम गर्भवती हुयी और उन्होंने 25 दिसम्बर को जेरूसलम के पास बेतलहम गाँव में ‘यीशु’ को जन्म दिया। माता मरियम ने जन्म के समय ईसा मसीह का नाम यीशु रखा। इस शब्द से अभिप्राय मुक्ति प्रदान करने वालों से है।

अपने नाम के अनुरूप ईसा मसीह ने जीवनभर मानवता के उद्धार के लिए कार्य किया । यहाँ तक कि अपने जीवन के अंतिम पल के अंतिम संघर्ष में उन्होंने शूली की महायातना को लोकहित में स्वीकारा। इस दिन को गुड फ्राइडे के रूप में मनाया जाता है। 

ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान यीशु मसीह पुनः जीवित हो उठे थे और 40 दिन तक सबके बीच रहे थे। इस दौरान उन्होंने सभी को ज्ञान की बातें सिखाई। कहा जाता है कि 40 दिनों बाद वह स्वर्ग चले गए। तब से लाखों करोड़ों श्रद्धालू और विश्वस्त भक्त जन क्रिसमस डे पर यीशु मसीह को याद करते हैं इस आशा से कि वे पुनः पुनर्जन्म लेंगें।

क्रिसमस को मनाने की तैयारी –

क्रिसमस का त्यौहार भले 24 दिसंबर की रात से मनना शुरू होता है, पर इसकी तैयारी दिसंबर महीने के पहले पड़ने वाले रविवार से ही शुरू हो जाती हैं। पूरा बाजार भी स्टार से लेकर क्रिसमस ट्री, सीनरी, सुन्दर ग्लासेज आदि से भर जाता है। 

वहीं क्रिसमस के दिन लोग अपने घरों तथा गिरजाघरों की अच्छी तरह से सफाई एवं सजावट करने के साथ-साथ खुद को भी शुद्ध और पवित्र करते हैं ताकि प्रभु येशु उनके हृदय में वास कर सकें। खुद को शुद्ध करने के लिए लोग दान-दक्षिणा भी इस दिन बड़ी उदारता से देते हैं, उपहार देते हैं और आपसी मनमुटाव को प्रेम के माध्यम से दूर करने का प्रयास करते हैं।  

क्रिसमस में उपहारों और मिठाइयों के पारस्परिक आदान-प्रदान के साथ-साथ क्रिसमस कार्ड्स का भी आदान-प्रदान किया जाता है। तरह-तरह के सुंदर और आकर्षक कार्डों का इस कार्य में प्रयोग किया जाता है। इन कार्डों पर शुभकामनाएं, बधाईया और शुभ सन्देश लिखकर मित्रों, संबंधियों तथा जान-पहचान के लोगों को भेजे जाते हैं। ये कार्ड हाथ से भी बनाए जाते हैं। परन्तु अब अधिकतर बाजार से बने बनाये ही काम में लाए जाते हैं।

क्रिसमस पर गीत-संगीत का भी कार्यक्रम होता है। भजन, प्रार्थना और विशेष तरह के गीत इस अवसर पर गाए जाते हैं। इन गीतों को “कैराल्स” कहते हैं। साथ में वाद्य संगीत का उपयोग भी किया जाता है।

सांता क्लॉज भी क्रिसमस पर्व का एक आवश्यक और अभिन्न अंग है। लाल कोट, टोपी और लंबी सफेद दाढ़ी वाले सांता क्लॉज के पास एक बड़ा सा थैला भी होता है, जिसमें बच्चों और गरीबों को दान देने के लिए कई तरह के उपहार होते हैं। इसमें मिठाई या चॉकलेट, खिलौने, पैसे आदि कुछ भी हो सकता है। इस तरह दान देने की इस प्रथा का प्रारंभ सेंट निकोलस ने प्रारंभ किया था।

सेंट निकोलस एक बड़ा दयालु और नेक पादरी था और गरीबों की सहायता के लिए सदा तत्पर रहता था। धीरे धीरे यह एक परंपरा बन गई और अनेक लोग सेंटा क्लॉज बनकर इस दिन उपहार बांटने का काम करने लगे। सेंटा क्लॉज अत्यंत हंसमुख, मज़ाकिया और दरियादिल होता है। बच्चों का उससे विशेष लगाव होता है क्योंकि वह उन्हें चॉकलेट, टॉफियां तथा अन्य उपहार देता है और उनके साथ नाचता गाता है। सेंटा क्लॉज के खिलौने और मुखौटे भी इस त्योहार पर खूब बिकते हैं। उपहार पाकर बच्चे बहुत प्रसन्न होते हैं। 

इस अवसर पर स्कूलों, अस्पतालों, गली-मोहल्लों आदि को भी बड़ी रूचि से सजाया और संवारा जाता है। इस दिन जुलूस और झांकियां भी निकालीं जाती हैं तथा ईसा मसीह के जीवन से संबंधित दृश्य एवं संदेश दिखाये जाते हैं। 

परस्पर भाईचारे और सौहार्द्र का यह पर्व अब दूसरे धर्मों और समुदायों के मध्य भी खासा लोकप्रिय होता जा रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 25 दिसंबर को दूसरे धर्मों के लोग भी चर्च पहुँचते हैं और मोमबत्तियां जलाकर प्रभु यीशु के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। इतना ही नहीं ये ईसाई समुदाय के लोगों के घरों में जाकर उन्हें प्रभु यीशु के आगमन की बधाई देते हैं और मौके पर बने लजीज पकवान का लुफ्त भी उठाते हैं।

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Babita Singh
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