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‘सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप’ निबंध – Sanch Barabar Tap Nahi Essay In Hindi

सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप (Sanch Barabar Tap Nahi Essay In Hindi) 

Sanch Barabar Tap Nahi Essay In Hindi - Nibandh
Sanch Barabar Tap Nahi In Hindi – Nibandh

Sanch Barabar Tap Nahi Essay In Hindi – ये शाश्वत सत्य है कि इस चराचर जगत की समस्त योनियों में मानव-योनि श्रेष्ठतम योनि है। देखने में भव्य, आकर्षक, लावण्यमय यह योनि मनुष्य को परमब्रह्म की असीम कृपा से मिलती है, या यूं कहें कि यह अद्भुत, अद्वितीय योनि किसी जीव को उसके अच्छे कर्मों और गुणों के फलस्वरूप प्राप्त होती है। आहार, निद्रा, भय, मैथुन आदि प्रवृत्तियां जगत के सभी पामर कीटों में होती हैं और मनुष्यों में भी होती हैं, परन्तु कूकर, शूकर, कीट, पंतग आदि की श्रेणी में से मनुष्य को निकालकर अलग खड़ा कर देने वाले केवल उसके जीवन के आदर्श गुण ही होते हैं।

शिष्टता, शीलता, नम्रता, उदारता, कर्तव्यनिष्ठा, सत्य भाषण आदि कुछ जीवन के अहम् गुण बताये गए हैं जो मनुष्य के शरीर, कुल और विद्या की लौकिक मान-मर्यादा बढ़ाते है। इसमें भी सत्यता का स्थान सबसे पहले है। सत्य भाषण मानव-जीवन के सभी आदर्श गुणों में शिरोमणि है। 

सत्य के विषय में कबीर दास की लेखनी से निकली एक ऐसी सूक्ति है जो हर युग में अक्षरक्ष: सही साबित होती हैसांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप सांच यानि सत्य सबसे बड़ा तप है। सत्य का कोई पालन कर ले तो समझना चाहिए कि उसने बहुत बड़ा तप कर लिया है। और झूठ सबसे बड़ा पाप है। ये एक ऐसा भयंकर अवगुण है जो मनुष्यों के अन्य असाधारण गुणों को भी अपनी काली छाया में ढक लेता है। इससे मनुष्य के चरित्र का पतन होता है, क्योंकि उसके हृदय में सदैव अशांति बनी रहती है और जो अशांत होता है उसको सुख कहा। “अशान्तस्यकुत: सुखम्?”।

वास्तव में सत्य में अद्भुत शक्ति होती है। सांच को आँच कहीं नहीं होती। सत्यवादी की समाज में प्रतिष्ठा होती है। जनता उसका हृदय से अभिनंदन करती है। उसकी मृत्यु का सौरभ चारों ओर फैलता है। मृत्यु के बाद भी सत्यवादी अपने यश रूपी शरीर से जीवित रहता है।

हमारे पूर्वज, जिन्हें आज भी संसार सत्यप्रेमी के नाम जानता है, राजा हरिश्चन्द्र, जिन्होंने सत्य की रक्षा के लिए अनंत यातनायें सहीं, स्वयं को बेचा, अपने पत्नी-पुत्र को बेचा, परंतु अपने सत्य से विचलित न हुए। महात्मा गाँधी ने सत्य को अपनाया और सुकरात सत्य के खातिर गरल पी गए और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त किए। अपने पूर्वजों की भांति हमें भी सत्य के सहारे ही जीवन में आगे बढ़ना चाहिए

यद्यपि आज के युग में दिखाई यह देता है कि झूठ बोलने वाला व्यक्ति बहुत उन्नति करता है और सच बोलने वाला व्यक्ति कष्टों से घिरा रहता है। गांधीजी ने कहा ही था कि सत्य का मार्ग खांडे की धार है। जिस पर चलना कठिन है, लेकिन यदि आपके चेहरे पर विजय की चमक है तो असत्यवादी देखते रह जायेंगे। इसलिए जब भी बोलों सत्य बोलों।

जहाँ सत्य है वहाँ ईश्वर है। आपने यह उदाहरण पढ़ा होगा कि एक लड़का नित्य भेड़िया आया, भेड़िया आया कहकर गांव वालों को डरा देता था। बेचारे गांव वाले उस लड़के की रक्षा करने के लिए डंडा ले-कर जंगल की ओर दौड़ते, परंतु वहाँ पहुँचकर कुछ भी न मिलता। गांव वालों ने समझ लिया कि यह लड़का झूठ बोलकर हमें बुलाता है। मतलब उन्होंने दूसरे दिन से जाना बंद कर दिया। एक दिन सचमुच ही भेड़िया आ गया, लड़का चिल्लाता रहा, परंतु कोई गांव वाला उसे बचाने न पहुंचा। भेड़िया उसे खा गया।

इस प्रकार झूठ बोलने से मनुष्य का विश्वास सदैव के लिए समाप्त हो जाता है। संसार से विश्वास उठ जाने का मतलब यह है कि उसका जीवित रहते हुए ही मृत्यु हो जाना। इसलिए ज्ञानी लोग सच को धारण करने की सलाह देते हैं और झूठ से दूरी बनाये रखने के लिए कहते हैं। चाहे इस मार्ग पर कितनी भी रुकावट क्यों ना आए; घबराना नहीं चाहिए अपितु उसका सामना सच्चाई से करना चाहिए।

सत्य की हमेशा विजय होती है। सत्य बोलने से आत्मा को भी संतुष्टि मिलती है और मन में साहस, धैर्य जैसे गुणों का वास होता है। इन्हीं कारणों से ज्ञानी जन सत्य को सबसे बड़ी तपस्या मानते हैं। हमारा पुनीत कर्तव्य है कि हम अपने जीवन में सत्य को ग्रहण करें और सत्य पथ पर चलें सत्य भाषण से हमें जीवन की सभी सुख, समृद्धि सुलभ हो सकती है।

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Babita Singh
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