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हिंदी दिवस पर कविता – Poem on Hindi Diwas In Hindi

हिंदी दिवस पर कविता – Poem on Hindi Diwas In Hindi

Poem on Hindi Diwas In Hindi - kavita
Poem on Hindi Diwas In Hindi – kavita

(1)

भारत के जन – जन का उद्गार है हिंदी,
हर इक के दिलो को जोड़ने का तार है हिंदी।
हर ओठों को, मुस्कान मिले जी भर,
ईश्वर का दिया गया अनुपम उपहार है हिंदी।।
बिहारी, केशव, भूषण का रीतिवाद है हिंदी,
स्थूल से सूक्ष्म तक रहस्यवाद जानने का,
प्रसाद, निराला, पन्त का ‘छायावाद‘ है हिंदी।
आती और जाती, सुबह – शाम है हिंदी,
हर लक्ष्य को पाने का मुकाम है हिंदी।
पी लो जितना चाहे दिन – रात छककर,
बच्चन की मधुशाला का छलकता जाम है हिंदी।
गीता, कुरान व बाईबिल का सार है हिंदी,
सुविसित गुलाब के फूलों का हार है हिंदी।
नहा लो चाहे जी भर प्यार से,
गंगा की बहती निर्मल धार है हिंदी।
हिन्दू, मुश्लिम, सिक्ख व ईसाईयों का संसार है हिंदी,
आपस में भाईचारा बढ़ाने का आधार है हिंदी।
हम रहें चाहे जितना भी अलग – अलग,
विभिन्नता में एकता को पिरोने में सूत्रधार है हिंदी।
किसानों की लगती मधुर चौपाल है हिंदी,
जवानों के सीनें में लगी हुई ढाल है हिंदी।
पड़ोसी मुल्को को सबक सिखाने हेतु,
हम सभी के करो में तीक्ष्ण तलवार है ‘हिंदी‘।।
हम सभी को मिला हुआ माँ का प्यार है हिंदी,
पिता का बच्चों को दिया गया दुलार है हिंदी।
खोजते रह जओगो, अनबूझी पहेलियों को तुम,
अगम असीम निधियों का पारावार है हिंदी।।
वीणा के निकलते मधुर स्वरों की झंकार है हिंदी,
बांसुरी के स्वरों की बहती रसधार है हिंदी,
रसाल पर कूँ कूँ कर, मदहोश कर देने वाली,
कोयल की सुरीली मधुर पुकार है हिंदी।।
फिल्मी जगत में अलग रखती पहचान है हिंदी,
फिल्मकारों की अदाओं की जान है हिंदी।
फिल्मों में चाहे जितनी भाषाओं के सुन ले गीत,
फिल्मी गीतों की आन – बान व शान है हिंदी।।
साहित्याकाश के तम को मिटाने में, सविता है हिंदी,
कवियों के मंथन से सृजित कविता है हिंदी।
डूबते उतराते रहो यूँ ही प्यार से,
जादू की बहती अजीब सरिता है हिंदी।
गम्भीर सागर को पार करने की पतवार है हिंदी,
राष्ट्रभाषा बनने की सचमुच हकदार है हिंदी।
श्रम से चूर होकर आ जाओ गोद में इसके,
राहत देती समझो रविवार है हिंदी।।

(2)

जन-जन की भाषा है हिंदी
भारत की आशा है हिंदी
जिसने पूरे देश को जोड़े रखा है
वो मजबूत धागा है हिंद
हिन्दुस्तान की गौरवगाथा है हिंदी
एकता की अनुपम परम्परा है हिंदी
जिसके बिना हिन्द थम जाए
ऐसी जीवनरेखा है हिंदी
जिसने काल को जीत लिया है
ऐसी कालजयी भाषा है हिंदी
सरल शब्दों में कहा जाए तो
जीवन की परिभाषा है हिंदी

(3)

हिंदी हमारी आन है हिंदी हमारी शान है,
हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है,
हिंदी हमारी वर्तनी हिंदी हमारा व्याकरण,
हिंदी हमारी संस्कृति हिंदी हमारा आचरण,
हिंदी हमारी वेदना हिंदी हमारा गान है,
हिंदी हमारी आत्मा है भावना का साज़ है,
हिंदी हमारे देश की हर तोतली आवाज़ है,
हिंदी हमारी अस्मिता हिंदी हमारा मान है।,
हिंदी निराला, प्रेमचंद की लेखनी का गान है,
हिंदी में बच्चन, पंत, दिनकर का मधुर संगीत है,
हिंदी में तुलसी, सूर, मीरा जायसी की तान है।,
जब तक गगन में चांद, सूरज की लगी बिंदी रहे,
तब तक वतन की राष्ट्रभाषा ये अमर हिंदी रहे,
हिंदी हमारा शब्द, स्वर व्यंजन अमिट पहचान है,
हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है।

(4)

भारत के हृदय का भाव हो तुम,
हिंदुस्तां की आवाज हो तुम।
तुमसे ही सभी हुए साक्षर,
इस राष्ट्र का आधार हो तुम।
मनोभाव साकार हुए तुमसे,
साहित्य रचे इतिहास लिखा,
मानव किससे कहो सभ्य बन।
किया हर भाषा को आत्मसात,
भारत की तरह शरणागत हो।।
आस्तित्व बिना तेरे है कहाँ?
जिसने तेरा सम्मान किया,
प्रेमचंद, द्विवेदी, प्रसाद, पंत,
महादेवी, निराला और है अनंत,
सबको कहा किसने समर्थ किया।।
विस्मृत कर तुमको जो भी गए,
वो क्या विकसित हो पायेंगे,
जड़ से कटकर भी वृक्ष कभी
क्या हरे भरे रह पाएं है।
उठो जागो संकल्प करो,
विकसित करके निज भाषा को,
भारत की शान बढ़ायेंगे,
हिंदी भाषी कहलायेंगे
हिंदी भाषी कहलायेंगे।

(5)

पढ़ा था विद्यालय में विषय गणित और विज्ञान
पर कभी ना दिया मैंने हिंदी पर ध्यान।
हिंदी है मेरी सबसे बड़ी पहचान
उसके बिना सब पूछते क्या है तेरा मान?

हिंदी को दिलाना है विश्व में सम्मान
कभी न देख सकूंगा हिंदी का अपमान।
हिंदी को हमें दिलाना है उसकी खोई हुई पद
हिंदी के सम्मान से बड़ा नहीं किसी का कद।

हिंदी को हमने माना अपनी राष्ट्रभाषा
विश्व में बोली जाए यह है हमारी आशा।
आज समय ऐसा है सबको भाता अंग्रेजी
पर हिंदी की मिठास को सब समझते पहेली।

हिंदी हमारी आशा है हिंदी हमारी भाषा है
हिंदी की उन्नति हो यह हमारी अभिलाषा है।
हिंदी को रुकने ना देंगे हिंदी को झुकने ना देगे।
हिंदी से सब कुछ सीखा है इसको कभी मिटने न देंगे।

क्यों समझते हैं सब अंग्रेजी बोलने को महान
भूल गए हम क्यों अंग्रेजी ने बनाया था हमें वर्षों पहले गुलाम।
सारी भाषाएं लेती हिंदी का सहारा
जय हिंद जय भारत यह नारा हमारा

आज उसी भाषा को हम क्यों करते प्रणाम
क्यों? केवल 14 सितम्बर को ही होता हिंदी का सम्मान।
जागो भारतीयों कहां गया हमारा स्वाभिमान।

(6)

बचपन से हिंदी ने मुझे पाला है,
अ – आ – माँ हिन्दी ने ही सिखलाया है,
मेरे देश को मातृभाषा का चोला पहनाया है,
इसकी प्रकृति और प्रवृति बड़ी अनूठी है,
आर्य और देव भाषा का उत्तराधिकार लिए,
प्राचीन भाषा संस्कृत की उत्तराधिकारिणी बनकर,
आज भारत की नवरंगी भाषाओं में,
अपनी पहचान लिए,
सबका प्रतिनिधित्व करती हिंदी,
राजभाषा बनकर अपने क्षेत्र को विस्तारित करती,
आज जन – जन में समाई है,
संस्कृत माँ की कोख से जन्म लेकर,
अपने हृदय को विस्तृत करके,
सबको उन्नति का मार्ग दिखाती है।

(7)

हिंदी से यह हिन्द बना है,
हिंदी से यह हिन्दुस्तान।
हिंदी से तुम प्यार करो तो,
बढ़ जाएगी इसकी शान।

हिंदी भाषा सबसे न्यारी,
हिंदी भाषा सबसे प्यारी।
सह ली बहुत उपेक्षा इसने,
अब तो रख लो इसका मान।
हिंदी से यह हिन्द बना है,
हिंदी से यह हिन्दुस्तान।

आजाद हुए थे इसके बल पर,
शान मिली थी इसके बल पर।
बहुत हो गया बहुत सुन लिया,
अब ना हो इसका अपमान।।
हिंदी से यह हिन्द बना है,
हिंदी से यह हिन्दुस्तान।

(8)

एक डोर में सबको जो है बांधती वह हिंदी है,
हर भाषा को जो सगी बहन मानती वह हिंदी है,
भरी-पूरी हो सभी बोलियां यही कामना हिंदी है,
गहरी हो पहचान आपसी यही साधना हिंदी है,
सोते विदेशी रह ने रानी यही भावना हिंदी है,
तत्सम, तद्भव, देश विदेशी रंगों को अपनाती,
जैसा आप बोलना चाहे वही मधुर वह मन भाती,
नए अर्थ के रूप धारती हर प्रदेश की माटी पर,
खाली पीली बोम मारती मुंबई की चौपाटी पर,
चौरंगी से चली नवेली प्रीति प्यासी हिंदी है,
बहुत-बहुत तुम हमको लगती भालो-बाशी हिंदी है,
उच्च वर्ग की प्रिय अंग्रेजी हिंदी जन की बोली है,
वर्ग भेद को खत्म करेगी हिंदी वह हमजोली है,
सागर में मिलती धाराएं हिंदी सबकी संगम है,
शब्द, नाद लिपि से भी आगे एक भरोसा अनुपम है,
गंगा कावेरी की धारा साथ मिलाती हिंदी है,
पूरब-पश्चिम कमल पंखुरी सेतु बनाती हिंदी है

(9)

मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम गाते हंसते हो
मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम अपने सुख दुख रचते हो

मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम सपनाते हो, अलसाते हो
मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम अपनी कथा सुनाते हो

मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम जीवन साज पे संगत देते
मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुम, भाव नदी का अमृत पीते

मैं वह भाषा हूं, जिसमें तुमने बचपन खेला और बढ़े
हूं वह भाषा, जिसमें तुमने यौवन, प्रीत के पाठ पढ़े

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मां! मित्ती का ली मैंनेतुतलाकर मुझमें बोले
मां भी मेरे शब्दों में बोली थी जा मुंह धो ले
जै जै करना सीखे थे, और बोले थे अल्ला-अल्ला
मेरे शब्द खजाने से ही खूब किया हल्ला गुल्ला

उर्दू मासी के संग भी खूब सजाया कॉलेज मंच
रची शायरी प्रेमिका पे और रचाए प्रेम प्रपंच

आंसू मेरे शब्दों के और प्रथम प्रीत का प्रथम बिछोह
पत्नी और बच्चों के संग फिर, मेरे भाव के मीठे मोह

सब कुछ कैसे तोड़ दिया और सागर पार में जा झूले
मैं तो तुमको भूल न पाई कैसे तुम मुझको भूले
भावों की जननी मैं, मां थी, मैं थी रंग तिरंगे का
जन-जन की आवाज भी थी, स्वर थी भूखे नंगों का

फिर क्यों एक पराई सी मैं, यों देहरी के बाहर खड़ी
इतने लालों की माई मैं, क्यों इतनी असहाय पड़ी

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Babita Singh
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