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हिन्दू धर्म पर निबंध – Hindu Religion Essay in Hindi

हिन्दू धर्म पर निबंध – Hindu Religion Essay in Hindi

Hindu Religion Essay in Hindi - Nibandh
Hindu Religion Essay in Hindi – Nibandh

Hindu Religion Essay in Hindi – जैसा कि विदित है, हिंदू धर्म का तत्वज्ञान महासागर की भांति अथाह, हिमालय की समान ऊॅंचा और आकाश की तरह अनंत है। ऐसे असीमित एवं अपरिमित विषय वस्तु के कारण ही इस धर्म को सभी धर्मों की जननी कहा जाता है।

ऐसे व्यापक धर्म का विस्तृत वर्णन संभव नहीं है। फिर भी इस धर्म से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का वर्णन यहां विहंगम दृष्टि से किया जाएगा । धन्य है भारत और यहां की पवित्र धरती जहां वट वृक्ष के रूप में हिंदू धर्म का बीजारोपण हुआ था। धन्य है यहां के सत्यशोधक जिनके तप और साधना से यह धर्म विश्वविश्रुत हुआ और धन्य हैं वह लोग जिन्हें हिंदू होने का सौभाग्य प्राप्त है।

हिंदू धर्म का उद्भव कब और किसके माध्यम से हुआ इसके बारे में परस्पर विवाद है। इस विषय पर मतैक्य का अभाव है। कुछ इतिहासकारों ने इतिहास को तोड़-मरोड़ कर जो तथ्य प्रस्तुत किए हैं उसमें तटथ्य दृष्टि नहीं पायी जाती है। ऐसे ही कुछ विचारक यह मानते हैं कि ‘ हिंदू ‘शब्द भारत के निवासियों की देन है। फारसी में ‘स ‘ का उच्चारण ‘ह ‘ होता है। अत: इस्लाम धर्म वालों ने सिंधु नदी के भूभाग को हिंदुस्तान या हिंदू देश कहा तथा यहां के निवासियों को हिंदू और उनके धर्म को हिंदू धर्म के नाम से पुकारना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार सनातन धर्म को ही हिंदू धर्म की संज्ञा दे दी गई।

उपर्युक्त विचार तर्कसंगत नहीं लगता क्योंकि हिंदू धर्म जिसे सनातन धर्म के नाम से जाना जाता है, इसकी जड़े बड़ी पुरानी हैं। सनातन शब्द का अर्थ है शाश्वत और प्राचीन। इससे यह स्पष्ट है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही यह धर्म गंगा की अविरल धारा की भांति प्रवाहित हो रहा है। इसकी परंपरा युग-युग से चली आ रही है। इसी हिंदू धर्म को भारतीय धर्म, भारतीय संस्कृति, वैदिक धर्म, सनातन धर्म, आर्य संस्कृति एवं आर्य धर्म आदि विभिन्न नामों से भी संबोधित किया जाता है। सनातन धर्म का अधिष्ठान वेद है।

धर्मदूत कहलाने वाले अनेक धर्मतत्ववेत्ता संतों, ऋषियों, तपस्वियों, योगियों, मुनियों एवं ब्रह्मर्षियों की साधनाओं, अनुभूतियों एवं सतत चिंतन मनन की पक्की नींव पर यह धर्म टिका हुआ है, जबकि अन्य धर्म की बात ही अलग है। अन्य धर्मों का उद्भव कालखंड के एक विशेष देवदूत या धर्मदूत के द्वारा एक निर्धारित सीमा के अंतर्गत हुआ था। उनके प्राय: देवदूत की वाणी और उनके आर्ष ग्रंथ को ही मान्यता दी जाती है।

परोक्षत: या अप्रत्यक्षत: वेदोक्त विचारों के आधार पर बने आचार-विचार, व्यवहार, रीति-नीति, समाज-व्यवस्था, धर्म आदि में किसी न किसी रूप में विश्वास करने वाले और उन पर चलने वाले भारतीय को हिंदू कहते हैं। वस्तुतः हिंदू एक संप्रदाय या प्रतीक नहीं है, अपितु इसके अंदर भारत की संस्कृति, जीवन मूल्य, पंथ, मत मतान्तरों का समवेत समावेश है। राष्ट्रवादी शब्द भी हैं जिससे राष्ट्रीय गौरव का मान होता है। इसके बारे में कहा गया है-

हिमालये समारंभ यावत् इंदु सरोवरम्।
तं देव निर्मितं देशं हिंदूस्थानं प्राचक्षते।।

अर्थात हिमालय से लेकर हिंदू सरोवर तक फैले समाज को हिमालय की प्रथम अक्षर ‘हि’ और हिंदू के अंतिम अक्षर ‘न्दु’ को मिलाकर बने शब्द हिंदू और उसका स्थान मिला देने से हिंदुस्थान कहा जाता है।

वेदों में सरकार के स्थान पर हकार का भी प्रयोग हो जाया करता है। इस संबंध में ‘सरस्वती’ ‘हरस्वती’ आदि वैदिक उदाहरण हैं। केसरी का ‘केहरी’ आदि अलौकिक उदाहरण भी प्रसिद्ध है। बाद में ‘सिंधु’ का ‘सिन्धव:’ ‘हिन्दयु’ का ‘हिन्धव:’ व्यवहार चलने लगा। कालक्रम से ‘धकार’ का परिवर्तन ‘दकार’ रूप में हुआ और हिंदू नाम चल पड़ा।

अपनी ‘स्मृति’ में हिंदू की परिभाषा करते हुए मनु ने लिखा है ‘हिंसया’ असमीपस्थ यस्मात् हिन्दुर्रित्याभिधीयते’ अर्थात् हिंदू वह है जो हिंसात्मक कर्म से दूर रहता है। कालिका पुराण, रामकोष, मेरु तंत्र, हेमंत कवि कोषकार आदि ग्रंथों में हिंदू शब्द का उल्लेख मिलता है। ये ग्रंथ स्वयं में प्राचीन ग्रंथ माने जाते हैं। इससे हिंदू धर्म की प्राचीनता स्वयं सिद्ध हो जाती है।

प्रसिद्ध विचारक श्रीपाद सातवलेकर का मत है कि हिंदू शब्द की प्राचीनता ईसा पूर्व ४८६ वर्ष तक मानी जाती है। यह शब्द उतना ही पुराना है जितना ‘भारतीय’ शब्द है। जैसे मेरुतंत्र (८वीं शती) में हिंदू का वर्णन मिलता है। इसमें लिखा है ‘हीनं च दूषयत्येषु हिंदुरित्याभिधीयते’ अर्थात हिंदू वह है जो हीन कर्म से द्वेष करता है। हेमंत कवि कोषकार ग्रंथ में कहा गया है ‘हिन्दुर्हि नारायणादि देवत: भक्त:’ अर्थात हिंदू नारायण आदि देवताओं का भक्त होता है। ऐसे अनेक दृष्टांत देखने को मिलते हैं।

वस्तुतः हिंदू धर्म संप्रदायवादी न होकर मानवतावादी है। यह जीवन के समग्र विकास का दर्शन है। ब्रह्म की व्यापकता के समान यह सार्वभौमिक, सर्वकालिक, एवं सर्वजनीन है। स्वयं धर्म शब्द की रिलिजन या मजहब का पर्यायवाची शब्द नहीं है। यह शब्द विश्वकोष में अपनी विशिष्टता की छाप छोड़ता है। धर्म शब्द संस्कृति भाषा के ‘धृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ है ‘धारण करना’ अर्थात धारण करने के कारण धर्म को धर्म कहते हैं। धर्म ही प्रजा को धारण करता है। जिस कर्म से जीव मात्र की धारणा होती है वह धर्म है। कहा भी गया है-

“धारणात् धर्ममित्याहु: धर्मो धारयते प्रजा:”

वैशेषिक दर्शन में महर्षि कणाद् ने कहा है,

“यतोअभ्युदय् नि:श्रेयस सिद्धिं से धर्म:”

अर्थात धर्म वह है जो अभ्युदय् एवं नि:श्रेयस यानी लोक और परलोक दोनों के लिए कल्याणकारी हो। इसी प्रकार मनु ने कहा है:-

धृति क्षमा दमोअस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।।

अर्थात धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय, पवित्रता, इंद्रिय निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध, (क्रोध न करना) यह 10 धर्म के लक्षण बतलाते हैं। याज्ञवल्क्य ने भी अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौचम, इंद्रिय-निग्रह, दान, दम, दया, शांति को धर्म का लक्षण कहा है। वस्तुतः यह जीवन मूल्य प्रायः कम या अधिक सभी प्रमुख धर्मों में पाए जाते हैं हिंदू धर्म का तो मूल ही इन पर आधारित है। हिंदू धर्म में व्यापकत्व है। इसमें सत्य तक पहुंचने के लिए अनेक उपासना पद्धतियां वर्णित हैं। जबकि अन्य धर्मों में साधक को एक ही उपासना पद्धति से होकर गुजरना पड़ता है। लोकमान्य तिलक में हिंदू धर्म के बारे में कहा है-

“साधनानां अनेकता उपास्यानां अनियम:”

अर्थात हिंदू धर्म में अनेक साधन हैं और अनेक उपासनाएं हैं।

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हिंदू धर्म सदा से गतिशील रहा है। विनम्रता की धारा इसमें सदा बहती रही है। कालक्रम में जब भी इस धर्म में धर्मांधता, जड़ता, आडंबर, उन्माद, एवं रूढ़िवादिता जैसे अवांछनीय तत्व प्रभावी हो जाते रहे, और जिनके कुप्रभाव से समाज दिग्भ्रमित हो जाता था, तब विचारकों द्वारा सुधारवादी आंदोलन प्रारंभ कर दिया जाता था, जिससे व्यक्ति और समाज दोनों का मार्ग प्रशस्त होता रहा है। ऐसे आंदोलनों की जड़ें यहां बहुत पहले से ही पायी जाती हैं। आइए, इसके क्रमबद्ध इतिहास की ओर अपनी नजर डालें।

उपनिषद कालीन ऋषि सुधार के अगुआ माने जाते हैं। वेदाधारित यज्ञ, अनुष्ठान और कर्मकांड में वाह्य रूप से जब व्यक्ति विशेष उलझ गया, आंतरिक चेतना का अभाव उसमें हुआ तब ऋषियों ने वेदांत एवं उपनिषद के माध्यम से आत्मज्ञान और ध्यान की परंपरा चला दी। विद्या, दृष्टि और बोध ही उपनिषद का लक्ष्य है, ऐसा डॉक्टर राधाकृष्णन ने कहा था। अत: उपनिषदों के माध्यम से ज्ञान की एक नई परंपरा चल पड़ी। उपनिषदों के पश्चात पुराणों के माध्यम से नए संदेश दिए गए। योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद भगवत गीता के द्वारा युगांतरकारी संदेश प्रदान कर आर्यावर्त देश में आध्यात्मिक क्रांति ला दी। प्रार्थना एवं भक्ति प्रधान संदेश के द्वारा भगवान ने जीवात्मा को सर्व भाव द्वारा अपने आश्रय स्थल परमात्मा की शरण में जाने पर बल दिया।

संत ज्ञानेश्वर ने कहा है कि वेद निद्रित भगवान की वाणी है जबकि गीता जागृत भगवान की वाणी है। भगवान श्री कृष्ण ने दीन हीन, स्त्री शूद्र जैसे सामान्य जन के लिए आत्मबल प्रदान कर मानव कल्याण का नवद्वार ही खोल दिया। धर्म को सर्वसुलभ कह कर उन्होंने भक्ति, ज्ञान, और कर्म में समन्वय स्थापित किया और ज्ञानयुक्त आचरण को प्रमुखता दी। ‘स्वधर्मे निधनं श्रेय:’, ‘तस्मात् योगी भव अर्जुन’ एवं ‘माम अनुस्मर युद्ध च’ जैसे वचनामृत का जयघोष कर उन्होंने धर्म में क्रांति ला दी।

अनुष्ठान, बलि एवं यज्ञदि वाह्याचरण की प्रमुखता तथा धार्मिक तत्वों के गौण हो जाने पर पुराण युग के पश्चात जब समाज में रूढ़िवादिता आ गई तब आत्म क्रांति के अग्रदूत महावीर स्वामी एवं बुद्धदेव ने अहिंसा के माध्यम से मानव जीवन को सम्यक् मार्ग पर चलने के लिए बल दिया था। उन्होंने आचार विचार अपनाकर यम-नियम के सीधे नियमों के माध्यम से नैतिक जीवन अपनाने को कहा था। वेदवाणी को तत्कालीन प्रचलित लोक भाषा में प्रस्तुत किया गया।

तत्पश्चात् जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म में भी अनेक विसंगतियां उत्पन्न हो गई और उनकी अनुपालन में गिरावट आ गई। इस को ध्यान में रखकर पुन: धार्मिक सुधार की आवश्यकता आ पड़ी। तभी आदि गुरु शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ। उन्होंने अपने प्रखर ज्ञान एवं अनन्य भक्ति से वेदांत दर्शन को पुनः प्रतिष्ठित कर सनातन धर्म को एक नई दिशा प्रदान की। उनके द्वारा प्रतिपादित आद्वैत दर्शन को कौन भूल सकता है। इससे हिंदू धर्म नए विचारों से पुनः गौरवान्वित हुआ।

यवनों के आक्रमण एवं कट्टर मुस्लिम शासकों के उत्पीड़न से भारतीय जनमानस जब भयाक्रांत हो उठा और धर्मांतरण से हिंदू धर्म पर संकट के बादल मंडराने लगे तब हिंदुओं में आत्मविश्वास और अपने धर्म में दृढ़ निश्चय उत्पन्न करने के लिए अनेक धर्माचार्यों एवं संतों का अवतरण हुआ। सभी के सामूहिक प्रयास से भक्ति आंदोलन का सूत्रपात हुआ। वेदों के रहस्य एवं पुराणों के महत्व को पुनः लोक भाषा में प्रस्तुत किया गया।

महाकवि तुलसी के ‘श्रीरामचरित मानस’ एवं ज्ञान देव महाराज की ‘ज्ञानेश्वरी’ के प्रभाव को कौन नहीं जानता है। तुलसी की रामभक्ति एवं नाम निष्ठा से संपूर्ण उत्तर भारत और संत ज्ञानेश्वर की कृष्णभक्ति से दक्षिण भारत विशेष प्रभावित हुआ। ज्ञानदेव जी ने तो भक्ति के समक्ष वर्णाश्रम के महत्व को ही कम कर दिया था। इसी क्रम में योगी गोरखनाथ, गुरु गोविंद सिंह, रामानुज, वल्लभाचार्य, चैतन्य, रामानंद, कबीर, रैदास, मीराबाई, एकनाथ, तुकाराम, पुरंदर दास जैसे संतों, योगियों एवं कवियों के उपकार से हिंदू जनमानस में आशा के दीप पुनः प्रज्वलित हो उठे। संत रैदास ने अपनी अमर रचना एवं साधना से राम को केंद्र मानकर प्रेम की गंगा ही बहा दी और बिखरे समाज को एक सूत्र में बांध दिया। हिंदू धर्म में पुनः जागृति आ गई।

19वीं शताब्दी में अंग्रेजों के शासन काल में पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव बढ़ने लगा। अंग्रेजों ने हिंदू धर्म एवं धर्म शास्त्रों को अपमानित कर यहां की संस्कृति के विरुद्ध शिक्षा एवं अन्य साधनों से अपनी आवाज उठाई। हिंदुओं में दीन हीन भावना का प्रसार होने लगा। भारतीय मनीषा कुंठित होकर चित्रकार करने लगी। तभी हिंदुओं में नवोत्थान का संदेश देने के लिए महान आत्माएं पुनः यहां अवतरित हुईं। स्वामी दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, राजा राममोहन राय, रानाडे, विवेकानंद, टैगोर, तिलक, अरविंद घोष, महात्मा गांधी, रमण, सावरकर, मालवीय, पोद्दार भाईजी एवं विनोबा भावे जैसे अनेक क्रांतिकारियों एवं मनीषियों के अभूतपूर्व उत्साह एवं कृतियों से हिंदू समाज में नवजागरण एवं नई स्फूर्ति की भावना पैदा हुई। हिंदुओं में नई चेतना आई। हिंदू धर्म को प्रखर राष्ट्रीयता का आधार बनाया गया। हिंदू संस्कृति का महत्व लोगों में बढ़ा । भारत स्वतंत्र हुआ।

हिंदू धर्म अनेक उपलब्धियों एवं विशेषताओं से भरा पड़ा है। सब की चर्चा यहां संभव नहीं है। फिर भी कुछ मौलिक तात्विक बिंदुओं की ओर ही ध्यान आकर्षित किया जा रहा है।

विश्व में हिंदुओं की एक ऐसी जाती है जिसने धार्मिक एवं दार्शनिक सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप प्रदान किया है, ऐसा विचार पंडित मदन मोहन मालवीय जी का है जिनके अनुसार पृथ्वी पर यही एक जाति है जो आत्मा की अमरता पर विश्वास करती है, अनेकता में एकता को देखती है और ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति करती है। या धर्म विश्व को मार्गदर्शन दे सकता है। उनके शब्दों में :-

उत्तम: सर्वधर्माणाम् हिंदूधर्मोंअयमुच्यते ।
रक्षय: प्रचारणीयश्च सर्वभूत हितेरत:।।

हिंदू धर्म का एक प्रमुख विचार है निष्काम कर्म योग का संदेश। इसे अपनाकर अनेक महान आत्माओं ने अपने-अपने स्वधर्म का पालन कर अपने जीवन को कृतार्थ किया था। इस धर्म में त्याग, बलिदान और भक्ति का अनुकरणीय आदर्श देखने को मिलता है। राजा हरिश्चंद्र की सत्य निष्ठा, दधिचि की हड्डी और रंतिदेव के दान आदर्श से यह संस्कृति बनी है। इसी प्रकार वशिष्ठ की सौम्यता, विश्वामित्र का पुरुषार्थ, महा पराक्रमी अर्जुन की वीरता, प्रहलाद की समता दृष्टि और बालक ध्रुव की अटल भक्ति जैसे अनेक आदर्शों से यह धर्म आज भी सुशोभित हो रहा है।

धर्म ही मानव जीवन में चरम विकास ला सकता है। मानव जाति में एकता धर्म से ही संभव है। सभी का अंतिम सत्य एक ही है। उसको प्राप्त करने का मार्ग भले ही भिन्न-भिन्न हो सकता है। इस दृष्टि से हिंदू धर्म ही ऐसा धर्म है जिसमें उपासना, पूजा, अनुष्ठान, मत मतान्तरों में भिन्नता होते हुए भी सभी को एक ही सत्य-परमात्मा तक पहुंचने के लिए अपनी निष्ठा के अनुसार मार्ग चयन करने की स्वतंत्रता है। इसमें साधक अपनी रुचि क्षमता और योग्यता के अनुसार अपनी साधना में तत्पर हो जाता है। कहा गया है – “एकं सत् विप्रा: बहुधा वदंति” अर्थात सत्य एक ही है। इसकी प्राप्ति के लिए विचारकों ने भिन्न-भिन्न मार्गों का वर्णन किया है। इस प्रकार हिंदू धर्म समरसता, सामंजस्य और जोड़ने की प्रवृत्ति में आज भी अग्रहरि है इसका साधन मार्ग ही बिरला है।

आत्मसाक्षात्कार एवं आत्मानुभूति के द्वारा आत्मतत्व को प्राप्त करना इस धर्म की एक प्रमुख विशेषता है। आत्मज्ञानी सन्यासपरक होकर संसार से विमुख हो जाय, अपने सामाजिक एवं पारिवारिक दायित्वों से अपना मुंह मोड़ ले, कोरा कल्पनाशील होकर व्यक्तिवादी बनकर स्वार्थी हो जाय, ऐसा उदाहरण इस धर्म में कम मिलेगा। इस धर्म में तो व्यक्तिवादी दृष्टि तभी सार्थक समझी जाती है जब व्यक्ति समाज हित में सदा लगा रहे। वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों में समन्वय लाकर एक पूर्ण व्यक्तित्व का आदर्श व्यक्ति को स्थापित करना पड़ता है तभी उसका कल्याण संभव होता है। जैसा कि भगवान श्री कृष्ण ने कहा था- “न ही कल्याणकृत कश्चित् दुर्गतिं तात् गच्छति।” अर्थात कल्याण मार्ग पर चलने वालों को अधोगति नहीं प्राप्त होती है।

हिंदू धर्म में संन्यास की तुलना में गृहस्थ जीवन को श्रेष्ठ माना गया है। श्रीमद भगवत गीता में संन्यास की तुलना में कर्मयोग को अधिक महत्व प्रदान किया गया है। वस्तुतः सन्यास और कर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। केवल एक से जीवन में पूर्णता संभव नहीं है। फिर भी ‘स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:’(गीता १८.४२) ऐसे भाव को भी व्यक्त किया गया है। याज्ञवल्क्य, जनक प्राचीन काल में और आज के युग में महात्मा गांधी और श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जैसे महापुरुषों ने संयास और कर्म दोनों पर ध्यान देकर जीवन में पूर्णता प्राप्त कर परम सिद्धि प्राप्त की है। ऐसे अनेक उदाहरण इस धर्म में मिलते हैं।

भवबंधन से छुटकारा पाने हेतु मोक्ष की प्राप्ति को हिंदू धर्म में अधिक महत्व दिया गया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थ में अंतिम मोक्ष को जीवन का चरम लक्ष्य कहा गया है। इसके लिए धर्माधारित जीवन को अपनाकर भगवत परायण होने पर अधिक बल दिया गया है। शंकराचार्य ने कहा है कि इस संसार में नितांत दुर्लभ तीन बातें होती हैं- एक मनुष्य योनि में जन्म, दूसरी महान संतों की कृपा और तीसरी मुक्ति या मोक्ष की उत्कृष्ट अभिलाषा। यानी सभी प्रकार की कामनाओं से दूर रहकर मोह, ममता, माया, आसक्ति का परित्याग कर आत्म तत्व के द्वारा परमात्मतत्व को प्राप्त करना। इसके लिए व्यक्ति को सभी प्रकार की मानवीय दुर्बलताओं से ऊपर उठना पड़ता है तभी तो जीवन में परम शांति यानी मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह भवबंधनों से भी मुक्त हो जाता है।

हिंदू धर्म में वैदिक शिक्षा प्रणाली यानी गुरुकुल की शिक्षा अपनी अलग पहचान रखती है। प्रचलित दुनिया की अन्य प्रणालियों से यह शिक्षा भिन्न रही है। साथ ही गुरु निष्ठा, आचार्योंपासना, माता पिता, अतिथि एवं परिजनों की सेवा आदि पर भी अधिक बल दिया जाता रहा है। लौकिक एवं परलौकिक दोनों विषयों में निष्णात होने के साथ-साथ ज्ञान के विविध क्षेत्रों में योग्य आचार्य द्वारा शिक्षार्थियों को शिक्षा दी जाती थी। धर्म, नैतिकता एवं आचरण हिंदू या वैदिक शिक्षा के मूल आधार थे। तभी तो विदेशी भी इससे प्रभावित होकर चरित्र और ज्ञान की शिक्षा लेने यहां आते थे, जैसा कि कहा गया है:-

एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मन:।
स्व-स्व चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।।

मौत से बढ़कर अनूदित भगवत चरणों में प्रीति तथा भक्ति की हिंदू धर्म में अधिक सराहना की गई है। भरत जी भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं:-

धरम न अरथ न काम-रुचि, गति न चहऊं निरवान।
जनम_जनम रति राम पद, यह वरदान न आन।।

इसी प्रकार संत तुलसीदास जी भी कह रहे हैं-

वेद-पुरान प्रगट जस जागे, तुलसी रामभक्ति वर मांगै।
तुलसीदास हरिचरण कमल-वर, देहु भक्ति अविनासी।।

निसंदेह हिंदू धर्म में भक्ति को सबसे अधिक महत्व प्रदान किया गया है। भक्ति को पंचम पुरुषार्थ के रूप में यहां मान्यता दी गई है, तभी तो स्त्री पुरुष, ऊंच-नीच, छोटा बड़ा, ज्ञानी अज्ञानी, सभी के लिए भक्ति मार्ग में प्रवेश पाने का अधिकारी समझा गया है। भक्ति आंदोलन के द्वारा भक्ति को सर्व सुलभ कह कर इसके माध्यम से सामाजिक एकता लाने का प्रयास किया गया। संत ज्ञानेश्वर ने गजेंद्र का उदाहरण देखकर बतलाया था कि पशु भी मोक्ष के अधिकारी हैं। तुम मनुष्य की बात ही अलग है। सामाजिक समरसता हेतु संतो ने कहा है:-

जात पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।

कहां जाता है कि ईसाई धर्म में करुणा और मुस्लिम धर्म में भाईचारे की भावना को हिंदू धर्म की अपेक्षा अधिक महत्व दिया गया है। बात ऐसी नहीं है यहां भी “सर्वभूते हिते रता:, कामये दु:ख तप्तानाम प्राणिनाम आर्तिनाशनम् जैसे आदर्श पाए जाते हैं। प्राणी मात्र की सेवा विशेषकर आर्तजनों के कल्याण पर इस धर्म में भी बड़ा महत्व दिया गया है, भले ही कालक्रम में इसमें गिरावट आ गई हो। हिंदू धर्म में ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे’ की भावना प्रबल रही है। ‘पंडिता: समदर्शिन:’ एवं ‘आत्मावत् सर्वभूतेषु’ के अनुसार आत्मौपम्येन (अपनी भांति) दृष्टि द्वारा अपने एवं पराये में भेद ही नहीं पाया जाता है। इसीलिए एक सच्चा हिंदू सभी में ब्रह्म भाव ही रखता है जैसा कि तुलसीदास जी ने कहा है-

सिय राममय सब जग जानी ।
करहु प्रणाम जोरि युग पानी।।

हिंदू धर्म अपने दर्शनों के लिए विश्व विख्यात है। मुख्यतः न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत दर्शन लोकप्रिय हैं। उनमें वेदांत प्रमुख है। शंकराचार्य ने अद्वैतवाद दर्शन के माध्यम से सभी के प्रति अभेद दृष्टि को प्रमुखता दी है। सभी में आत्मा समान रूप से पाई जाती है अतः भेद का प्रश्न ही नहीं उठता है। अद्वैत, द्वैत एवं विशिष्टाद्वैत सिद्धांतों में ब्रह्म और जीव के संबंधों की चर्चा के साथ-साथ जगत की भी विशद चर्चा की गई है। इससे हिंदू धर्म में ज्ञान की परंपरा पहले से ही चली आ रही है। ज्ञान प्रधान यह धर्म विश्व विख्यात रहा है।

हिंदू धर्म में वर्णाश्रम पद्धति विशेष लोकप्रिय मानी जाती है। वर्णाश्रम व्यवस्था के तात्विक मर्म को समझकर ही महात्मा गांधी ने मानव समाज के लिए हिंदू धर्म की एक प्रमुख देन के रूप में वर्णाश्रम को माना था। वस्तुतः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का विभाजन गुण, कर्म एवं संस्कार के आधार पर किया गया था न की जन्म से। कालांतर में इसमें गिरावट आ गई। अनेक विसंगतियां उत्पन्न हो जाने के कारण अस्पृश्यता आदि दुर्गुण समाज में फैल गए।

वस्तु के जन्म से सभी शूद्र होते हैं। कर्म से वर्ण बनता है। ब्राह्मण को द्विज कहते हैं। कहां गया है ‘जन्मना जायते शूद्र: संस्कारात् द्विज उच्यते’ अर्थात जन्म से भले ही व्यक्ति शूद्र हो परंतु संस्कार के कारण उसे द्विज कहा जाता है। कहा गया है कि प्रारंभ में सभी ब्राह्मण थे, परंतु कर्म की सुविधा एवं समाज की आवश्यकता अनुसार अन्य वर्णों का नामकरण क्रमशः होता गया। जैसे बिना पैर के मुख का अस्तित्व नहीं, बिना पेट के हाथ निष्क्रिय हो जाते हैं। सब में परस्पर सहयोग आवश्यक समझा जाता है। ठीक उसी प्रकार चारों वर्णों के मिलने से समाज का सम्यक संचालन होता है, जैसे सभी अंगों के संयुक्त प्रयास से ही व्यक्ति का शरीर (व्यक्तित्व) सुसंगठित हो जाता है। वास्तव में सद्गुण एवं सदाचार ही मनुष्य की श्रेष्ठता के परिचायक हैं। संत ज्ञानेश्वर ने ठीक ही कहा है कि गुणों के विकास से ही अभ्युदय और नि:श्रेयस की प्राप्ति होती है। और सदाचारी वर्णाश्रम व्यवस्था के मूल आधार स्तंभ है।

कर्म सिद्धांत एवं पुनर्जन्म के प्रति आस्था हिंदू धर्म में बहुत पहले से पाई जाती है। जीव अपने पुनर्जन्म के शुभ एवं अशुभ कर्मों के आधार पर प्रारब्धानुसार अगला जन्म पाता है। पुनर्जन्म के संस्कार के अनुसार ही व्यक्ति का व्यक्तित्व भी निर्मित होता है, ऐसा भाव इस धर्म में पाया जाता है। कर्म का फल तो व्यक्ति को मिलता ही है। कहांश गया है :-

कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करहिं सोफल चाखा।।

विश्व बंधुत्व एवं विश्व हित अर्थात संपूर्ण विश्व के प्रति मंगल की भावना रखना हिंदू धर्म का सनातन सत्य है। प्रोफेसर जैनेंद्र कुमार का विचार है कि हिंदुत्व समूचे मानव मात्र के लिए शुभ जीवन दर्शन का नाम है। यह शब्द संस्कृति बोधक है । वेदों में ‘विश्व मानुष’ शब्द आया है। वैदिक संस्कृति में वैश्विक चेतना को प्रधानता दी गई है। मैक्स मूलर आदि अनेक विदेशी बंधुओं द्वारा विश्व बंधुत्व की भावना की भूरी भूरी प्रशंसा की गई है। आज भी आचार्य विनोबा भावे ने जय जगत का नारा दिया है हिंदू धर्म पर आधारित राष्ट्रीयता कभी भी स्वार्थ प्रेरित नहीं रही है, और ना दूसरे राष्ट्रों का अनिष्ट ही चाहती है। यह तो सदैव विश्व शांति एवं मैत्री भाव को प्रश्रय दी है। एक विचारक ने ठीक ही कहा है, भारत समग्र विश्व का है, संपूर्ण वसुंधरा इसके प्रेम भाव में आबद्ध है। अनादि काल से ज्ञान की, मानवता की ज्योति या विकीर्ण कर रहा है। वसुंधरा का हृदय भारत के किस मूर्ख को प्यारा नहीं है।

धार्मिक एकता को अधिक महत्व हिंदू धर्म में दिया गया है। सर्वधर्म समभाव इसका मूल मंत्र है। प्रियदर्शी सम्राट अशोक की धर्म नीति इतिहास प्रसिद्ध है। धर्मनिरपेक्षता का आदर्श अशोक के शासनकाल से हमें सीखना चाहिए। उसने सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखा और किसी के साथ पक्षपात पूर्ण व्यवहार नहीं किया। हिंदू धर्म का जयघोष रहा है मानव धर्म एवं मानव कल्याण। हमें बलात् धर्म परिवर्तन से सदा विरोध रहा है। आज भी गांधीजी के रामराज्य का आदर्श और सर्वोदय दर्शन सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार रखते हैं। भारतीय लोकतंत्र का भी यही आदर्श है भले ही व्यवहार में स्वार्थ वश आज के राजनेता गढ़ सर्वधर्म समभाव के विपरीत आचरण करते हुए पाए जाते हैं।

हिंदू धर्म करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र बिंदु है। इसमें जाति भाषा क्षेत्रीयता, सामाजिक परंपरा, रुचियों व मान्यताओं आदि में भिन्नता होते हुए भी कुछ ऐसे मौलिक बिंदु हैं जिनके प्रति सामान्यतः प्रत्येक हिंदू की आस्था रहती है जैसे, ऊं, गाय, गीता, गंगा, गणेश, गौरी, गया एवं काशी तीर्थ, पीपल, तुलसी, आंवला, वट वृक्ष आदि। इसी प्रकार सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, तारे, पर्वत, नदियां एवं अन्य वनस्पतियों के प्रति भी एक हिंदू का अस्तित्व भाव रहता है। स्थावर और जंगम दोनों के प्रति आस्था इस धर्म में पाई जाती है।

वास्तव में वेदादि धर्म शास्त्र के अनुसार आचरण करने वाला हिंदू कहलाता है। स्वामी करपात्री जी महाराज के अनुसार एक प्रामाणिक हिंदू वह है जो वेद शास्त्रोक्त धर्मों में निष्ठा रखता हो, साथ ही वेदादीशास्त्रानुसार जो विश्वासमान होकर उस धर्म में प्रतिष्ठित हो। फिर भी प्रमाण की अपेक्षा ना हो तब भी तो वास्तविक संग्राहक लक्षण यही है कि गोभक्ति, प्रणवादि, नामपूजा, पुनर्जन्म विश्वास, हिंदुत्व के प्रयोजन हो सकते हैं। जैन, बौद्ध, सीख, हिंदू सब में या लक्षण संगत हो जाता है:-

गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवादौ दृढ़ा मति:।
पुनर्जन्म विश्वास: सवैहिंदूरिति स्मृत:।।

ब्रह्मविद्या एवं अध्यात्म के प्रति समर्पित आचार्य विनोबा भावे ने हिंदू धर्म को विश्व में एक ऐसा धर्म कहा था जिसके धर्म ग्रंथों द्वारा गुण दोष से अलग निरपेक्ष भाव से भक्तों को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। वेद वेदांत और गीता का सार यही है कि ब्रह्म सत्य है जगत स्फूर्ति है और मानव जीवन की उपयोगिता है सत्य का शोधन करना जैसा कि विनोबा भाभी जी स्वयं कहते हैं:-

वेद वेदांत गीतानाम विनुना सारउद्धृत।
ब्रह्म सत्य जगत स्फूर्ति जीवनम् सत्यशोधनम्।।

वस्तुत: शिवोअहम् को मान्यता देने वाला या हिंदू धर्म प्रत्येक व्यक्ति को ‘अमृतस्य पुत्रा:’ अर्थात अमृत का पुत्र मानता है, और अमरत्व के लिए सदा जीवन में जय की मंगल कामना करता है। एक विचारक ने ठीक ही कहा है:-

“हम भारतवासी आर्य जाति के वंशधर हैं। यही आर्य भाव हमारा कुल धर्म और जाति धर्म है। ज्ञान भक्ति और निष्काम कर्म आदि शिक्षा के मूल तत्व हैं तथा ज्ञान, उदारता, प्रेम, साहस, भक्ति, शक्ति और विनय आर्य जाति के लक्षण हैं।” वास्तव में यह गुण ही हिंदू धर्म की मौलिक विशेषताएं हैं। आर्यत्व ही हमारा मूल संस्कार रहा है।

हिंदू धर्म में निरपेक्ष नीति मूल्यों में विश्वास, आत्मा के अस्तित्व में अखंड विश्वास, दूध की क्षुद्रता एवं नश्वरता, मृत्यु के बाद जीवन की अखंडता, प्राणी मात्र की एकता और पवित्रता, मनुष्य जीवन में पूर्णता, परहित की भावना, स्वधर्म का पालन आदि कुछ ऐसे महत्वपूर्ण विषय हैं जिनके प्रति हिंदू धर्म की विशेष पैठ एवं पहचान है। ऐसे महत्वपूर्ण विचारकों के कारण ही इस धर्म को महान कहा जाता है और इसीलिए भारत को धर्मगुरु की संज्ञा दी गई है।

महावीर, गौतम बुद्ध, शंकराचार्य, कौटिल्य, जरथुस्त्र, मूसा, ईसा, मुहम्मद, नानक, झूलेलाल आदि धर्म गुरुओं के संदेश इस धर्म में समवेत रूप से समाहित हैं। यह धर्म सदा से उदार, व्यापक एवं सर्वग्राही रहा है। कहा भी गया है:-

विद्वदभि: सवित: सद्भिर्नित्यम द्वेष रागिभि:।
हृदये नाभ्युनुज्ञातो यो धर्मस्तं निवोधत्।।

अर्थात जिस धर्म को रागद्वेष विहीन ज्ञानी संतो ने अपनाया और जिसे हमारा हृदय और बुद्धि भी स्वीकार करती है वही धर्म है। हिंदू धर्म की जीवंतता और तेजस्विता का यही कारण रहा है कि इसमें सर्वदा राग द्वेष विहीन आचार्य एवं धर्मगुरुओं का मार्गदर्शन प्राप्त होता रहा है।

वस्तुतः आधुनिक संदर्भों में धर्म की अहम भूमिका है। इस बात से कदाचित कोई इनकार करें कि धर्म अब अपने व्यापकत्व एवं प्रभाव को खो चुका है। धर्म तो सदा से ही नवनिर्माण एवं नवोस्थान का वातावरण का सृजन करता ही रहा है। आज की उत्पन्न भीषण समस्याओं के समाधान हेतु अनेक विकल्प पर विचार किया जा सकता है, परंतु उनमें धर्म के माध्यम से नए मस्तिष्क एवं स्वस्थ दृष्टिकोण का निर्माण कम महत्वपूर्ण नहीं सिद्ध होगा, वशर्तें हम सच्ची निष्ठा एवं लगन के साथ धर्म के प्रति समर्पण की भावना रखें और तदनुसार आचरण भी करते रहें। इस संदर्भ में डॉक्टर राधाकृष्णन ने ठीक ही कहा है:-

धर्म ही आदर्श विश्व व्यवस्था में समर्थ है। हिंदू मत यह मानता है कि प्रत्येक धर्म सच्चा है, पर तभी जब उसके अनुयायी पूरी ईमानदारी के साथ उसका पालन करते हैं। धार्मिक जीवन का उद्देश्य पृथ्वी पर आदर्श लोक उतारना और व्यक्ति में एक उच्चतर चेतना को प्राप्त करना है। धर्म यह बताता है कि आदमी का सर्वोच्च लक्ष्य स्वतंत्रता और विवेक से अद्भुत शांति है। धर्म का मुख्य उद्देश्य मानव का पुनर्निर्माण ही है। धर्म ही विश्व के संबंध में उसका दृष्टिकोण बदल सकता है और उसे स्वार्थी से नि:स्वार्थी ही बना सकता है।

हिंदू धर्म से न केवल भारत की अपितु विश्व की अपेक्षा है। महर्षि रमण एवं अरविंद जैसे संतों की यह भविष्यवाणी है कि आने वाले युग में यही धर्म मानवता के लिए त्राण सिद्ध होगा। ‘सनातनो नित्य नूतन:’ अर्थात सनातन मूल्य है नित्य नूतनता लाएंगे, ऐसा कहा गया हैं। अत: वेदांत, विश्वास, सत्य, प्रेम, करुणा, योग, उद्योग और सहयोग जैसे बिंदुओं पर आधारित यह हिंदू धर्म ही विश्व में मानवीय एकता का संदेश लाएगा तभी आज की आसन्न अनिष्ट से व्यक्ति को छुटकारा मिलेगा। क्योंकि हिंदू धर्म अन्य धर्मों की तुलना में व्यापक, उदार, सर्वग्राही एवं पूर्वाग्रह मुक्त है।

हिंदू धर्म का लक्ष्य मानव जाति को नवीन रूप देना है, तथा मानव प्रकृति का आध्यात्मिक रूपांतरण करना है। अनंत संभावनाएं मानव में निहित हैं, नारायण संपूर्ण विकास की छोरहीन सीमा है। नर यात्री है और नारायण मंजिल। नर को अपने चतुर्दिक विकास के लिए अपनी आत्मा की कामना को प्रभु की ओर मोड़ देना चाहिए। नर जब पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ नारायण की शरण में जाएगा तभी उसके अंदर आत्मिक शांति की अनुभूति होगी और उसके अंदर देवत्व की भावना भी जाग्रत होगी। ऐसा करने से ही व्यक्ति आज उत्पन्न में भीषण चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित कर सकेगा।

इस प्रकार हिंदू धर्म में पुनः सुधारवादी जन आंदोलन प्रारंभ करने की महती आवश्यकता है। ऐसे आंदोलन अपने पूर्ववर्ती आदर्शों का प्रतीक होना चाहिए। हिंदू धर्म में निहित गुढ़तत्वों एवं महत् आदर्शों पर व्यापक विचार -विमर्श, शोध एवं चिंतन कर हमें एक ऐसे सुसंस्कृति, नीति प्रधान एवं मूल्यपरक समाज के नव निर्माण की ओर उन्मुख होना चाहिए जिसमें नीतिधर्म का अनुपालन भली-भांति संपादित किया जा सके। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की मंगल कामना के साथ प्रभु से हमारी यही प्रार्थना है कि वह हमें ऐसी शक्ति दें जिससे हम अपने स्वधर्म का पालन निष्ठा पूर्वक कर सकें, तभी तो धर्म हमारी रक्षा करेगा।

अंत में प्रोफेसर लुई रेनो का यह विचार है कि “धर्मों के इतिहासकार के लिए हिंदू धर्म अध्ययन का एक अप्रतिम चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें त्रुटियां अनेक हैं, किंतु इसमें रहस्यपूर्ण शक्ति की महान धारा है; याद धर्म की संपूर्ण धारणाओं को व्यक्त करता है तथा उसकी कल्पना उन्हें नित्य नूतन रूपों में प्रकाशित करती रहती है। अपनी मूलभूत परंपरा को सुरक्षित रखते हुए भी उसमें बार-बार नवीन होने की शक्ति है।” अतः इस नवीनता की विश्वास को लेकर हम पुनः सनातन धर्म की ओर मुड़ने का साहस करें जो सभी जातियों एवं संप्रदायों को अनुप्राणित करता है। यही वास्तविक आत्मा का धर्म है।

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Babita Singh
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