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पंचतंत्र की कहानियाँ – Panchatantra Stories In Hindi

पंचतंत्र की कहानियाँ (Panchatantra Stories In Hindi)

Panchtantra ki Kahaniyan - Stories With Moral
Panchtantra ki Kahaniyan – Stories With Moral

बगुला भगत…

प्रातः काल का समय था। सूर्य की किरणें घर-घर में जाकर सब लोगों को जगा रही थीं। और उसी ने अपनी सुनहरी किरणों से तालाब में जाकर मछलियों को भी जगाया। जगने के पश्चात मछलियां अपने-अपने घरों से निकलकर बाहर आईं । और उन्होंने तालाब के किनारे एक बगुले को खड़े हुए देखा, जिसकी आंखें बंद थीं और वह एक पांव पर खड़ा होकर कुछ गुनगुना रहा था।

यह देखकर एक मछली ने दूसरी मछली से कहा – देख तो ! आज बगुला जी भगत बन गए। जबकि पहले तो सुबह उठकर ये हमारा शिकार करते थे, परन्तु आज ये आंखें बंद करके राम नाम का जाप कर रहें हैं। सब कुशल, मंगल है न। अपनी सखी की ये बाते सुनकर दूसरी मछली ने कहा – अरे सखी..! उस बगुला भगत के धोखे में आकर तुम प्रणाम करने न चली जाना। वरना कही ऐसा न हो कि वे आशीर्वाद देने के बहाने तुम्हे ही खा ले।

दूसरी मछली ने यह बात बहुत ही धीरे से कही थी किंतु बगुले के पतले कानों तक पहुंच गई। बगुले ने आंखें खोल कर कहा, “राम-राम, सुबह-सुबह ऐसी बात मुंह से न निकालो! अब मैंने अहिंसा व्रत ले लिया है और मछलियों को मारना तो दूर रहा, उनका मन दुखाना भी पाप समझता हूं । मैंने जवानी के दिनों में बहुत पाप किए हैं, अब उनका पश्चाताप करना चाहता हूं। मैं सारी रात महात्माओं के चरणों में बैठकर सत्यनाम की कथा सुनता हूं और दिन को यहां तालाब के किनारे बैठकर भगवान का भजन करता हूं।

प्यारी मछलियों! तुम्हें शायद मुझ पर विश्वास न आए, किंतु मैं तुम्हें सच – सच बता दूं कि मेरा मन भगवान की भक्ति से इतना पवित्र हो गया है कि आगे होने वाली बातों का भी पता चल जाता है।”

मछलियाँ सोचने लगी कि न जाने किस महात्मा ने इनके कान में मंत्र फूंक दिया है कि एक ही दिन में ये शिकारी से भगत बन गए हैं। यही सोचकर मछलियों ने कहा- भगत जी, यदि यह बात है तो ज्योतिष लगाकर कुछ हमारे विषय में भी बताइए कि क्या होने वाला है।

बगुले ने बनावटी आंसू निकालकर भरे हुए स्वर में कहा –

रोना आता है मुझे, बतलाते यह बात
आयु तुम्हारी शेष है, केवल दस दिन रात।

अब तो मछलियां बहुत घबराई । सबने एक ही स्वर में बगुले से पूछा-भगत जी, हमें शीघ्र बताइए कि क्या तालाब में कोई रोग फैलने वाला है या कोई भयंकर जंतु यहां आने वाला है, जिससे हमारे प्राणों को भय है?

बगुले ने कहा- अरी मेरी भोली मछलियों! ना कोई भयंकर रोग तुम्हें समाप्त कर सकता है और ना कोई जंतु। इन दोनों से बढ़कर भगवान की ओर से तुम पर एक भारी आपत्ति आने वाली है। आज से 9 दिन बाद यह तालाब बिल्कुल सूख जाएगा और तुम सब मछलियां पानी के बिना तड़प तड़प कर मर जाओगी। तुम्हारी विपत्ति को स्मरण करके न मुझे दिन को चैन आता है, न रात को नींद। मैं भगवान से तुम्हारे बचाव के लिए प्रार्थना करता हूं, किंतु मुझे दीखता है कि होनी होकर ही रहेगी।

बगुला भगत की बात सुनकर सब मछलियों को अपनी-अपनी चिंता पड़ गई। सब बगुले के सामने रो – रो कर और गिड़गिड़ा कर कहने लगीं-भगत जी! आप ही हमारे सच्चे हित चिंतक हैं, इसलिए इस विपत्ति से छूटने का आप ही हमें कोई उपाय बताइए।

बगुले ने लंबी सांस लेकर कहा – हां, तुम्हारे बचाव का केवल एक उपाय है। इस तालाब से आधा मील दूरी पर एक बहुत बड़ा तालाब है, जिस का जल 12 वर्षों तक वर्षा ना होने पर भी नहीं सूखता। यदि सब मछलियों की इच्छा हो तो मैं एक-एक करके सब मछलियों को बारी-बारी से उस तालाब तक ले जा सकता हूं।

मछलियों ने बगुले की बात बड़े हर्ष के साथ स्वीकार कर ली। फिर क्या था! बगुला एक-एक मछली को मुंह में पकड़ कर ले जाने लगा। दूसरे तालाब में ले जाने का तो बहाना ही था। वास्तव में बगुला एक -एक मछली को दूर ले जाकर चट कर जाता था और फिर दूसरी को लेने आ जाता था। इस प्रकार जब सांझ तक उसका पेट भर जाता तो शेष मछलियों को कहता-

क्षमा करो इस बूढ़े तन में, इससे अधिक नहीं है जोर
आज थका हूं ले जाकर, कल ले जाऊंगा मैं और

इस प्रकार दूसरे दिन भी वह उतनी ही मछलियां तालाब ले जाता, जितनी खाने से उसका पेट भर जाता, इस प्रकार मछलियों को खाते बगुले को बहुत दिन हो गए। उस तालाब में एक केकड़ा भी रहता था। एक दिन उसने बबूले से कहा-भगत जी! जब आप परोपकार करके तालाब के जीवों को बचा ही रहे हैं, तो कृपा करके मुझे भी दूसरे तालाब में पहुंचा दीजिए। क्योंकि मैं सारे तालाब में अकेला ही केकड़ा हूं, इसलिए मुझे और मछलियों से पहले वहां ले चलें तो बहुत अच्छा है।

बगुले का जी भी मछलियां खा खाकर कुछ ऊब गया था, अतः वह भी केकड़े का करारा मांस खाना चाहता था। इसलिए दूसरे दिन व केकड़े को चोंच में उठाकर तालाब से दूर ले चला।

अभी वह कुछ ही दूर गया होगा कि हड्डियों का ढेर देखकर केकड़ा, धूर्त बगुला भगत की सारी चालाकी समझ गया। उसने अपने मन में निश्चय किया कि मरना तो वैसे भी है, क्यों ना कुछ यत्न करके देखा जाए? हो सकता है कि मरने से बच जाऊं।

यह सोचकर केकड़े ने अपने पैने पंजे बगुले के गले में चुभा दिए। बगुले का गला वैसे ही कोमल होता है, अतः पंजे के चुपते ही वह टें बोल गया। फिर केकड़ा धीरे-धीरे रेंगता हुआ पहले तालाब में आ पहुंचा और उसने बगुला भगत की पोल मछलियों के सामने खोल दी। केकड़े की बात सुनकर मछलियों ने कहा-

भगत जगत को ठगत है, लेकर हरि का नाम
चोट करारी करत है, जब भी लगता दांव।

ओछे का संग, अच्छा भी तंग…

एक ग्वाला सिर पर दही का मटका रखे हुए नगर की ओर जा रहा था। मार्ग में वह एक विशाल वट वृक्ष कि नीचे से गुजरा, जिस पर पहले से ही बैठे हुए एक कौवे की दृष्टि मटके में भरे हुए दही पर पड़ गई। वह उड़ता हुआ ग्वाले के पीछे हो लिया। और बार-बार झटपट कर मटके से दही खाने लगा। यह देख कर ग्वाले ने अपना मटका सिर से उतार कर नीचे रख दिया और गुलेल में कंकड़ लगाकर ऊपर आसमान की ओर पक्षी को ढूंढने लगा।

संयोगवश, उस समय एक बटेर ग्वाले के बिल्कुल ऊपर आकाश में उड़ रहा था। लेकिन उस बटेर को न दही का पता था और न ही कौए की धूर्तता का; इसलिए वह मग्न होकर आकाश में उड़ा जा रहा था।

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उधर जब कौए ने कानी आंख से देखा कि ग्वाले ने मटका उतारकर गुलेल तैयार कर ली है, तो वह एक ओर भाग गया। इसीलिए ग्वाले की दृष्टि आकाश में उड़ते हुए बटेर पर पड़ी। ग्वाले ने सोचा हो ना हो यही बटेर मेरे मटके में चोंच मार रहा था। यह सोचकर उसने अपनी गुलेल में कंकड़ फंसा कर बटेर को इतनी बेग से मारा की वह बेचारा फड़फड़ाता हुआ नीचे आ गिरा।

छटपटाते हुए बटेर ने एक बार आकाश की ओर देखा तो पास ही उसे कौआ उड़ता हुआ दिखाई दिया, यह देखकर बटेर समझ गया कि कौए की दुष्टता का फल उसे भोगना पड़ गया। बटेर ने यह गुनगुनाते हुए दम तोड़ दिया – ओछे का संग, अच्छा भी तंग।

मिसाल… 

एक घने जंगल में एक पेड़ पर एक कबूतर कबूतरी का जोड़ा रहता था। उनमें आपस में बहुत प्यार था। एक दिन एक शिकारी शिकार करने के लिए उस जंगल में आया। दिन भर घूमने फिरने पर भी उसे कोई शिकार न मिला। वह थक हार कर उसी पेड़ के नीचे आकर बैठ गया जहां वह कबूतर कबूतरी का जोड़ा रहता था।

उस दिन रोजाना से कहीं अधिक ठंडी ठंडी हवा चल रही थी जिसके कारण शिकारी का खून जमने लगा। कबूतर कबूतरी ने जब उसे ठंड से कांपता हुआ देखा, तो उन्हें उस पर बहुत दया आई।

कबूतर ने कबूतरी से कहा, हम तो अपने घोसले में आराम से बैठे हुए हैं और हमारे अतिथि जो पेड़ के नीचे बैठे हुए ठंड से कांप रहे हैं। हमें उनका सत्कार करना चाहिए। तब कबूतरी ने पूछा, हम इनका आतिथ्य सत्कार कैसे कर सकते हैं?

थोड़े विचार विमर्श करने के बाद कबूतर ने कहा – एक उपाय है जिससे हमारे अतिथि ठंड से बच सकते हैं। इनकी ठंड को दूर करने के लिए हमें अपना घोंसला नीचे गिरा देना चाहिए। जिससे यह हमारा घोंसला जलाकर ताप लेंगे। इस प्रकार उसकी ठंड दूर हो जाएगी।

कबूतरी बोली, इनको भूख भी लग रही होगी। इसके बारे में भी तो हमें कुछ सोचना चाहिए। यह जो आग जलाएंगे मैं उस आग में गिर जाऊंगा और यह मेरा भुना हुआ मांस खा लेंगे। कबूतर ने कहा। दोनों इस बात पर सहमत हो गए और उन्होंने अपना घोंसला नीचे गिरा दिया ।

संगठन की शक्ति…

एक प्राचीन मंदिर के छत के ऊपर बहुत सारे कबूतर बैठा करते थे। वह वहां खुश थे। जब मंदिर के वार्षिक उत्सव के उपलक्ष में वहां की मरम्मत का कार्य शुरू हुआ तो सभी कबूतर उड़ कर पास ही बनी हुई चर्च की छत पर चले गए। वहां पहले से रह रहे कबूतरों को अपने नए साथियों के आने से कोई परेशानी नहीं हुई। सब खुशी-खुशी रहने लगे।

कुछ दिन बाद क्रिसमस थी, तो चर्च को सजाने की तैयारियां होने लगी। अबकी बार सभी कबूतरों ने पास वाली मस्जिद की छत पर अपना डेरा बना लिया। मस्जिद पर पहले से रह रहे कबूतरों ने भी बड़ी खुशी से नए साथियों को अपने में मिला लिया।

रमजान का समय भी नजदीक आ गया। मस्जिद को पेंट किया जाना था। अबकी बार सारे कबूतर उड़ कर वापस मंदिर की छत पर आ गए।

एक बार मंदिर के शिखर पर बैठे एक कबूतर के बच्चे ने देखा कि विभिन्न धर्मों के लोग आपस में लड़ रहे हैं। उसने अपनी मां से पूछा कि यह लोग कौन है? मां ने कहा, मनुष्य। फिर बच्चे ने पूछा, क्यों लड़ रहे हैं? मां ने कहा, जो मंदिर जाते हैं वह हिंदू है, जो चर्च जाते हैं वह ईसाई हैं और मस्जिद जाने वालों को मुसलमान कहते हैं।

फिर बच्चे ने पूछा, ऐसा क्यों है ? हम सब मंदिर पर बैठते हैं। तब भी कबूतर ही कहते हैं। इसी तरह वे भी चाहे कहीं भी जाएं, उन्हें मनुष्य ही बोलना चाहिए।

मां ने ऊपर की ओर देखते हुए कहा, मैंने तुमने और हमारे दूसरे साथियों ने उसे पा लिया है तभी हम इतने पवित्र स्थलों की ऊंचाई पर शांति से रह रहे हैं। अभी इन लोगों को उसे अनुभव करना बाकी है तभी वह इस तरह एक दूसरे से लड़ रहे हैं।

गधा सिंह नहीं होत…

एक था धोबी। उसका गधा बहुत भार उठाते उठाते निर्बल हो गया था। इसीलिए धोबी ने गधे को शेर की खाल पहनाकर पास के खेतों में छोड़ दिया। जिससे गधे की पांचों उंगलियां घी में हो गई। उसे एक तो धोबी के काम से छुट्टी मिल गई और दूसरी ओर पेट भर खाने को भी मिलने लगा।

इस प्रकार वह जिस खेत में मन करता चला जाता और बढ़िया से बढ़िया घास तथा अनाज खाता। खेतों के रखवाले भी उसे शेर समझ कर खुद ही भाग जाते। इस प्रकार गधा घास पात खाकर खूब मोटा हो गया।

एक दिन एक किसान ने निश्चय कर लिया कि वह शेर को मार कर सब का भय दूर करेगा और अपनी फसल की रक्षा भी करेगा। यह सोचकर उसने भूरे रंग का कंबल ओढ़ लिया और धनुष बाण लेकर एक झाड़ी की ओट में बैठ गया।

अचानक गधे की दृष्टि झाड़ी की ओर पड़ी । उसने यह समझा किया कोई भरा गधा झाड़ी के पीछे रहता है जो बेचारा कई दिनों से अकेला रह – रह कर उकता गया है इसीलिए अपनी जात भाई से मिलने के लिए वह ढींचू-ढींचू करता झाड़ी की ओर भागा।
अगले ही क्षण उसकी बोली पहचान कर किसान ने कहा- अरे! यह तो गधा है । किसी ने हमें डराने के लिए इसे शेर की खाल पहना दी है। अपनी फसल नष्ट होने के कारण किसान क्रोध में तो था ही उसने एक ही बाण चला कर गधे को चित्त कर दिया।

इसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य भी अपनी बोली से पहचाना जाता है। चाहे कोई कितने ही अच्छे कपड़े क्यों ना पहन ले, वह अपने असली स्वभाव के विषय में लोगों को अधिक देर तक धोखा नहीं दे सकता। वह ज्यों ही अच्छी या बुरी बात मुंह से निकालेगा, लोग उसे अवश्य पहचान जाएंगे कि मनुष्य कैसा है। इसीलिए सयाने लोग कह गए हैं कि हमें सदा अच्छे वचन बोलना चाहिए।

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Babita Singh
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