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महात्मा गाँधी जयंती पर भाषण – Mahatma Gandhi Jayanti Speech In Hindi

गाँधी जयंती पर भाषण

Gandhi Jayanti Essay In Hindi - Speech

Gandhi Jayanti Essay In Hindi – Speech

Gandhi Jayanti Essay In Hindi – Speech – नमस्कार! आप सभी को गाँधी जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं. जैसा की आप सब जानते है आज हम यहाँ  महात्मा, राष्ट्रपिता यानि अपने प्यारे बापू का जन्मदिन (गाँधी जयंती) मनाने और उनको सम्मानित करने के लिए एकत्रित हुए है. महात्मा गांधी के आदर्शों को याद करने के लिए इस दिन से अच्छा कोई और दिन नहीं है.

इस दिन को मनाने की बड़ी महत्ता है क्योंकि गाँधी जयंती केवल एक दिवस नहीं है बल्कि यह भारतीय जनमानस के लिए एक आदर्श है. इस दिन को तो हर भारतीय को स्वेच्छा से याद करना चाहिए. क्योंकि वे आशिर्वाद स्वरूप जो स्वतंत्रता का उपहार हमें दे गए हैं वह बेहद कीमती है. इस बात को बहुत समय पहले ही हर भारतीय ने जाना और माना तभी तो गांधी जयंती मोहनदास करमचन्द गांधी के सम्मान में मनाया जाने वाला हमारा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पर्व बन गया.

सच में सत्य अहिंसा के बल पर देश और दुनिया भर में ख्याति अर्जित करने वाले ऐसे महानतम महात्मा गांधी पर हमें गर्व हैं और हमेशा रहेगा. वे एक युग पुरुष थे. उन्होंने अपने युग को प्रभावित किया और मानवता को सत्य और अहिंसा का संदेश दिया. ऐसे महापुरुष के जन्मदिन को गाँधी जयंती के रूप में मनाना वाकई हमारे लिए बड़े ही सौभाग्य की बात हैं.

आप को बता दे कि महात्मा गांधी के विचार और क्रियात्मक योगदान से न केवल हम हिन्दुस्तानी प्रभावित है बल्कि इनके अहिंसात्मक विचारों का लोहा पूरा विश्व मानता है और इसीलिए 2 अक्टूबर गांधी जयंती पर हमारे प्यारे बापू को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी याद किया जाता है. यह विशेष दिन विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है. 

कितनी अद्भुत बात है किसी को नहीं पता था कि साधारण से दिखने वाले महात्मा गाँधी एक दिन भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के निदेशक बनेंगे. लेकिन यही हकीकत है जबकि जिस समय महात्मा गाँधी का जन्म हुआ उस समय जगह – जगह क्रांति की ज्वाला धधक रही थी. लड़ाईयां हो रही थी. हिन्दू मुसलमान, ऊँच – नीच तमाम प्रकार के भेद वर्तमान में विराजमान थे.

ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए सबकी इच्छा एक ऐसे व्यक्ति की थी जो सभी जाति – पाती और हिंसा के भेदो को मिटाकर अहिंसा का मार्ग दिखाए. और तब 2 अक्टूबर, 1869 ई. गुजरात के काठियावाड़ जिले के पोरबन्दर नामक स्थान पर एक वैश्य परिवार में इनके प्रथम दर्शन हुए. इनके पिता का नाम कर्मचंद्र गाँधी और माता का नाम पुतलीबाई था. बचपन में ही सत्य हरिश्चंद्र नाटक देखने से इनपर हरिश्चंद्र के गुणों का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा और ये उसी समय से परम सत्यवादी बन गए.

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1887 में में इन्होंने ‘प्रवेशिका’ परीक्षा पास की. कानून के अध्ययन हेतु 1888 में इग्लैंड गए. वहा इन्होंने ‘इनरटेपल’ से बैरिस्टरी पास की और अपने देश में इसका अभ्यास शुरू किया लेकिन लज्जालु स्वभाव के होने के कारण बैरिस्टरी में सफल नहीं हो सके.

कुछ दिनों बाद एक नये मुकदमे के शिलशिले में इन्हें अफ्रीका जाना पड़ा जहाँ भारतियों पर गोरों के अत्याचार को देखकर इनका दिल दहल उठा और वहां के भारतियों को जगाने के लिए इस देव – विभूति ने दृढ़ संकल्प लिया. अफ्रीका में ही इन्होंने सर्वप्रथम अहिंसात्मक सत्याग्रह रूपी अमोघ अस्त्र का प्रयोग किया.

1914 में ये भारत लौटकर अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की तथा चम्पारण में किसानों की रक्षा के लिए निलहे गोरों के अत्याचारों के विरुद्ध भैरव – हुँकार किया. सन 1920, 1930, 1940, 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व गांधीजी ने किया जिसके लिए इनको अनेको बार जेल के शिकंजो को भी तोड़ना पड़ा. अपार कष्टों और लाठियों की मार ने भी इन्हें अपना अहिंसा का मार्ग बदलने के लिए मजबूर न कर सका.

6 जुलाई 1944 को सुभाषचंद्र बोस देश से बाहर होने की वजह से रेडियों के माध्यम से गांधीजी को संबोधित करते हुए भाषण दिया और भाषण में उन्होंने जापान से सहायता और आजाद हिन्द फ़ौज के गठन का उद्देश्य बताया. इसी भाषण में उन्होंने गांधीजी को पहली बार राष्ट्रपिता कहकर आशीर्वाद मांगा और तभी से गांधीजी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहे जाने लगे.

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने करो या मरो के नारे द्वारा स्वतंत्रता के आन्दोलन को उग्र रूप प्रदान किया. नतीजा 15 अगस्त 1947 को भारत देश अग्रजों की गुलामी से आजाद हुआ.देश की आजादी के बाद इन्होंने कोई भी पद लेने से इंकार कर दिया और देश की नि:स्वार्थ सेवा में सदैव तत्पर रहे. महात्मा गांधी सत्य और अहिंसा के प्रतीक थे. इस महान इंसान ने कदम – कदम पर खुद को गढ़ा और अपना पूरा जीवन भारत को आजाद करने में लगा दिया.

30 जनवरी 1948 को हमारे प्यारे बापू यानि महात्मा गांधी के देह को नाथूराम गोडसे ने क्षत – विक्षत कर दिया. पर क्या वह हमारे राष्ट्रपिता को मार सका ? यकीनन नहीं. वह आज भी लाखों करोड़ों लोगों की हृदय में जिन्दा है क्योंकि सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी ने देश की आजादी को कभी भी जीवन का अन्तिम लक्ष्य नहीं माना. उनकी नजर में स्वराज्य तो केवल दासता से मुक्ति थी और बेहतर जिंदगी का साधन मात्र थी. उन्होंने बारम्बार यह बात कही कि उनके लिए इस आजादी का तब तक कोई मूल्य नहीं जब तक कि सबसे पीड़ित और सबसे कमजोर को शोषण और अन्याय से मुक्ति न मिले.

गांधी जी कहते थे कि “न सिर्फ भारत की बल्कि सारी दुनिया की अर्थरचना ऐसी होनी चाहिए कि किसी को भी अन्न और वस्त्र के अभाव की तकलीफ न सहनी पड़े. दूसरे शब्दों में हर एक को इतना काम अवश्य मिल जाना चाहिए कि वह अपने खाने – पहनने की जरूरते पूरी कर सके और यह आदर्श निरपवाद रूप से तभी कार्यान्वित किया जा सकता है, जब जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं के उत्पाद के साधन जनता के हाथ में रहे.”

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बापू के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विचार आज के उपभोक्तावादी, तनावग्रस्त एवं अशांत दुनिया को उज्जवल भविष्य की ओर ले जाने में कारगर एवं प्रासंगिक है. गांधी जयंती के द्वारा हम उनके इन्हीं विचारों को सामाज में फैलाने का आवाहनं करते है.

हर साल गांधी जयंती के अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री दिल्ली के राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते है तथा देश के कोने – कोने में विभिन्न उद्देश्यपूर्ण क्रिया – कलापों का आयोजन होता है. भाषण व संगोष्ठियाँ की जाती है. गांधी जी के पसंदीदा चीजों को धारण कर उनके प्रति सच्ची श्रद्धा एवं श्रद्धांजलि व्यक्त किए जाते है. उनके बताएं गए रास्तों पर चलने का संकल्प लिया जाता है.

राष्ट्रपिता का पसंदीदा भजन “वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीर पराई जाने रे” को समुदाय, समाज, शिक्षण संस्थान सरकारी कार्यालयों आदि सभी जगहों पर लोग सुनते है तथा बापू को शांति और सच्चाई के उपासक के रूप में याद करते है.

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Babita Singh
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