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परहित सरिस धर्म नहिं भाई – Essay on Paropkar In Hindi

परोपकार का अर्थ और जीवन में परोपकार का महत्व पर निबंध

Paropkar (परोपकार)
Paropkar (परोपकार)

परोपकार शब्द का अर्थ है, अपने स्वयं के भले की चिंता किए बिना दूसरों की मदद करना। वो परोपकार नहीं होता जो स्वार्थ के वशीभूत होकर किया जाए। और न ही किसी पर तरस खा कर मदद कर देना परोपकार है, असल में जब किसी को सच में मदद चाहिये हो और आप उसकी मदद बिना किसी अपेक्षा के कर दें तो वह सबसे बड़ा परोपकार है।

चुकि यह परोपकार निस्वार्थ भाव से किया जाता है इसलिए बदले में परोपकारी प्राणी बड़ा आत्म संतुष्टि (लाभ) मिलता है जिसे लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं खरीदा जा सकता। इसलिए परोपकार को मानव धर्म में सर्वोपरि कहा जाता है। परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है। परोपकार ऐसा कृत्य है जिससे शत्रु भी मित्र बन जाता है।

इस संदर्भ में प्रकृति हमारी सच्ची शिक्षक है। परोपकार प्रकृति के कण-कण में समाया हुआ है। भरी-पूरी प्रकृति में यह भावना सहज और स्वाभाविक रूप ही पायी जाती हैं। प्रकृति का कण-कण हमें परोपकार की शिक्षा देता है। पृथ्वी परोपकार  के लिए अपने प्राणों का रस निचोड़ कर हमारा पेट भरती है। प्राण – वायु प्रदान करके पर्यावरण और वायुमंडल को शुद्ध करने के साथ – साथ हमारी श्वसन क्रिया में सहायक होता है। इसी प्रकार, अनन्त जल-राशि का भार वहन करती हुई नदियाँ अपने जीवन के प्रभात से सन्ध्या तक अनवरत रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान तक आजीवन प्रभावित होती रहती हैं, केवल दूसरों के कल्याण के लिए।

आँधी और तूफानों के अत्याचारों को वृक्ष मौन होकर सह लेते हैं, वे सोचते हैं संभवतः कभी वह दिन भी आयेगा जब थके – माँदे मुसाफिरों को हम अपनी छाया प्रदान कर तथा क्षुधार्तों को अपने मधुर फल देकर अपना जीवन सफल कर सकेंगे। जबकि इसमें उनका कोई लाभ नहीं होता है।

मेघों ने धरिणी से प्रत्युपकार में कभी अन्न की याचना नहीं की, युग – युग से वे इसी प्रकार का जल भर कर लाते हैं और धरिणी के अंचल को आर्द्र करके एक बार फिर लौट जाते हैं, परन्तु प्रतिदान का शब्द कभी उनके मुख तक नहीं आता है। जिस वृक्ष को पतझड़ ठूँठ बना देता है, वसंत के पत्ते उसे निःस्वार्थ स-वसना नारी की भाँती शोभायमान बना देता है।

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प्रकृति को लक्ष्य कर के हमारे कहने का आशय बस इतना है कि जब प्रकृति अपनी परोपकार वृत्ति का निर्वाह निरन्तर करती रहती हैं। प्रकृति पदार्थ के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर देती है। तब व्यक्ति तो एक विवेकशील प्राणी हैं। जिसके भीतर परोपकार, सहयोग की भावना संबंधी मूल प्रवृत्ति के रूप में मौजूद होती है। इस मौलिक और ताकतवर भावना को उसे भी निःस्वार्थ और निराभिमानता से अपने भीतर उपजने का मौका देना चाहिए। यही मानवता का सच्चा आदर्श है। यही सच्ची मनुष्यता है।

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हमारे राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त ने भी कहा है कि ‘वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।’ अर्थात मनुष्य वही है जो केवल अपने सुख – दुःख की चिंता में लीन नहीं रहता, केवल अपने स्वार्थ की बात नहीं सोचता, जिसका शरीर लेने के लिए नहीं देने के लिए है जिसके जीवन का अर्थ खाना, पीना और मौज करना नहीं है, अपितु निःस्वार्थ भाव से मनुष्य की सेवा करना है।

यह परोपकार किसी भी रूप में कर सकते है। धन है तो निर्धनों की सहायता करके। शिक्षा है तो उसको अशिक्षितों में वितरित कर के। बल है तो आशक्तों की मदद कर के। अर्थात परहित साधना ही मनुष्यता है, यही सबसे बड़ा भगवन भजन है। वास्तव में परोपकार के समानं न कोई दूसरा धर्म है और न पुण्य। परोपकार एक उत्तम आदर्श का प्रतीक है।

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मानवता का उद्देश्य और मानव जीवन की सार्थकता, केवल इसी में है कि वह अपने कल्याण के साथ दूसरों के कल्याण की सोचे। उसका कर्तव्य है कि स्वयं उठे और दूसरों को भी उठाए। जीवन में कुछ भी स्वत: हासिल नहीं होता, परोपकार की भावना से ही मानव समाज फलता – फूलता है, मानव समाज की उन्नति परोपकार पर ही टिकी हुई है।

यदि समाज में रहने वाले व्यक्ति सामाजिक हित के स्थान पर अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ – साधना में लिप्त रहें, समाज के सुख – दुःख से नाता तोड़ दें, तो ऐसी स्थिति से हमारा समस्त समाज आँधी के प्रबल वेग से उड़ते हुए तिनकों की भाँती छिन्न – छिन्न हो जाएगा। अत: समाज की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि समाज में जीवन यापन करने वाले प्रत्येक व्यक्ति परोपकार के आदर्श से अपने जीवन का निर्माण करे।

आत्म-शक्ति और जीवन का सच्चा आनन्द परोपकार से ही प्राप्त होता है। परोपकारी पुरुषों की यशचंद्रिका ही संसार में छिटकती है। सभी लोग श्रद्धा और आदर की निगाहों से उन्हें देखतें हैं। देवताओं के समान उनकी पूजा करते हैं। राजा केवल शक्ति के बल पर मनुष्य शरीर पर अधिकार करता है, परन्तु परोपकारी मनुष्य गरीबों से लेकर अमीरों तक के हृदय पर शासन करता है। वह अपने जीवनकाल में ही यश का भागी नहीं बनता, अपितु मृत्यु के उपरांत भी उसका यश संसार में छाया रहता है। वह मरकर भी अमर बनता है।

भारत भूमि पर ऐसे बहुत से महान लोग हुए हैं जिन्होंने बहुत परोपकार के कार्य किये हैं, यहाँ सभी का नाम गिनाना मुश्किल है पर महात्मा गाँधी, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, ईसा मसीह ऐसी विभूतियाँ हैं जिन्होंने मानव जाति के सम्मान लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। अत: हमारा भी कर्तव्य हैं कि हम अपने इन महापुरुषों के जीवन का अनुसरण करें । यही हमारे जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

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Babita Singh
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