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Gadar Party की स्थापना किसने, कब की एवं इसका मुख्यालय कहाँ था?

गदर पार्टी का इतिहास 

ग़दर पार्टी की इंक़लाबी आँदोलन का इतिहास
ग़दर पार्टी की इंक़लाबी आँदोलन का इतिहास

Gadar Party in Hindi – नमस्कार ! जैसा कि ज्ञात है भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान नये – नये आंदोलन उभरकर सामने आ रहे रहे थे। इनमें से कुछ आंदोलनों की तैयारी तो देश के भीतर हुई पर कुछ आंदोलन ऐसे भी हुए जिनका जनम देश के बाहर हुआ। इनमें से विदेशों में क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए एक गदर पार्टी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

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गदर पार्टी (Gadar Party) की संस्थापक —

ये वे जाग्रत समूह थे, जो क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम चरण के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा आदि में बस गए थे तथा जो न केवल अमेरिका में हिंदुस्तानियों के अधिकारों के लिए प्रयासरत थे, बल्कि अपने मातृदेश भारत के लिए भी कुछ कर सकने की भावना से ओतप्रोत थे। इन लोगों ने अमेरिका (America) के सैन फ़्रांसिस्को (San francisco) के एस्टोरिया में 25 जून, 1913 में अंग्रेज़ी साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से ‘हिंदुस्तानी एसोसिएशन’ बना ली थी।

बाबा सोहन सिंह भकना इस एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष थे तथा सन् 1915 के गदर आन्दोलन के प्रमुख सूत्रधार थे। पार्टी की स्थापना लाला हरदयाल ने की थी। वे इसके प्रचार विभाग के सदस्य महासचिव थे। इसके अतिरिक्त केसर सिंह थथगढ (उपाध्यक्ष), लाला ठाकुरदास धुरी (संयुक्त सचिव) और पण्डित कांशीराम मदरोली (कोषाध्यक्ष) थे।

साप्ताहिक पत्र ग़दर

ग़दर 1 नवम्बर 1913 में हिन्दी, गुरुमुखी, उर्दू एवं गुजराती भाषा में प्रकाशित एक साप्ताहिक पत्र था। लाला हरदयाल इसके संस्थापक थे। लाला हरदयाल के अमेरिका में सूचना होने पर एसोसिएशन के लोगो ने लाला हरदयाल को सेंट जॉन बुलाया। यहीं हरदयाल ने इन्हें ग़दर नामक पत्र निकालने का सुझाव दिया। आस – पास के क्षेत्रों में कई सभाएँ हुई। कमीरबख्श तथा केसरसिंह के साथ हरदयाल एस्टोरिया आये तथा यही एक बैठक में सैन फ़्रांसिस्को से ग़दर निकालना निश्चित किया गया। 

ग़दर का संचालन भारत की स्वतंत्रता के लिये सशस्त्र आन्दोलन करने वाला एक गुप्त संगठन युगान्तर प्रेस या युगान्तर आश्रम से किया जाता थायुगांतर प्रेस उस समय साहित्य और सियासत के प्रशिक्षण का ऐतिहासिक केंद्र था जिसका उद्देश्य युवा भारतीयों में देशभक्ति की भावना को अधिकाधिक फैलाना था तथा उन्हें सशस्त्र विद्रोह के लिए प्रेरित करना था।

लिहाजा 1 नवम्बर 1913 को ग़दर पत्रिका का जब पहला अंक प्रकाशित हुआ तो उसमें खुलेआम लिखा था : “आज से बाहर के देशों में ब्रिटिश राज के विरुद्ध युद्ध का आरंभ होता है। हमारा नाम क्या है ? — ग़दर ! हमारा काम क्या है ? — ग़दर ! यह ग़दर कहां पर फूटेगा ? — भारत में।” इस तरह ग़दर पत्रिका के पन्ने-पन्ने पर सशस्त्र विद्रोह का आह्वान किया गया था। ग़दर समाचार पत्र में छपने वाली कविताओं को ‘ग़दर की गूंज’ शीर्षक से प्रकाशित किया जाता था।

बाद में यह ग़दर अख़बार इतना प्रसिद्ध हुआ कि इस दल का नाम ही ग़दर पार्टी कहा जाने लगाअपने कार्यों के बल पर ‘ग़दर’ पत्र ने संसार का ध्यान भारत में अंग्रेज़ों के द्वारा किए जा रहे अत्याचार की ओर दिलाया। परन्तु  गदर पार्टी के तौर-तरीके और गदर की विचारधारा को देश में काफ़ी आलोचनाएं सहन करनी पड़ीं लेकिन इस बात में कोई संदेह की गुंजाइश नहीं कि गदर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने विश्व युद्ध के आसार को भारत में क्रान्ति के अवसर की तरह लिया था।

गदर के नेताओं ने निर्णय ले लिया था कि वे ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ उसकी ही सेना में घुसकर विद्रोह करेंगें। प्रथम विश्वयुद्ध धीरे-धीरे क़रीब आ रहा था और ब्रिटिश हकुमत को सैनिकों की बहुत आवश्यकता थी अत: पार्टी ने आह्वान कर सभी हिन्दुओं से कहा गया कि वे हिन्दुस्तान की ओर लौटें और ब्रिटिश हकुमत के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह में भाग लें।

गदर पार्टी के नेता पानी और जल के रास्ते भारत पहुंचना चाहते थे। इसके लिए कामागाटामारू, एस.एस. कोरिया और नैमसैंग नाम के जहाजों पर हजारों गदर नेता चढकर भारत की ओर आने लगे।इसी बीच सितम्बर 1914 को सरकार ने एक अध्यादेश पारित किया जिसके तहत राज्य सरकारों को यह अधिकार दे दिया गया कि वे भारत में दाखिल होने वाले किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेकर पूछताछ कर सकेंगे भले ही वह भारतीय मूल का क्यों न हो। पहले बंगाल और पंजाब की राज्य सरकारों को यह अधिकार दिये गये और इसके लिए लुधियाना में एक पूछताछ केन्द्र भी स्थापित किया गया।

इसी बीच कामागाटा मारू के यात्री इस अध्यादेश के पहले शिकार बने। 19 सितंबर सन् 1914 में ‘कामागाटामारू’ जहाज की घटना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह पहले से चले आ रहे क्रांतिकारी ग़दर आंदोलन की चरम परिणति थी।

कनाडा सरकार ने इस जहाज को अपनी सीमा से बाहर कर दिया। जहाज के याकोहामा पहुंचने से पूर्व ही पहला विश्व युद्ध प्रारम्भ हो गया। भारत की ब्रिटिश सरकार ने जहाज को सीधे कलकत्ता लाने का आदेश दिया। जहाज के ‘बजबज’ पहुंचने पर यात्रियों एवं पुलिस के मध्य झड़प हुई जिनमें 18 यात्री मारे गये और शेष 202 को जेल में डाल दिया गया। इसकी ख़बर मिलने पर देश-विदेश में रहने वाले भारतीयों के बीच ग़म और गुस्से की लहर दौड़ गयी।  

किसी तरह सशस्त्र विद्रोह के उद्देश्य से फ़रवरी 1915 तक लगभग आठ हज़ार प्रवासी लुक-छिपकर भारत पहुंच चुके थे और  गुप्त रूप से छावनियों में काम करने लगे थे। पर विद्रोह नहीं हो पाया। बहुत से आंदोलनकारी पकड़ लिये गये और जेलों में डाल दिये गये। इस तरह ग़दर पार्टी का आंदोलनकारी क्रियाकलाप समाप्त हुआ।

ग़दर आंदोलन भारत में ब्रिटिश शासन का तख्ता पलटने में भले ही असमर्थ रहा, परंतु मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए सूदूर विदेशों में बसे भारतीयों के सर्वस्व समर्पण, आत्मबलिदान तथा आम भारतीय जनमानस में स्वातंत्र्य चेतना विकसित करने वाली उनकी भूमिका में वे जरूर सफल रहे। 

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Babita Singh
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