Hindi Post Nibandh Vrat-Tyohar

छठ 2018 – छठ व्रत विधि और पूजा विधि (Chhath Maiya Vrat & Pooja Vidhi in Hindi)

छठ पूजा कैसे करें,  Chhath Puja in Hindi, 2018 छठ पूजा की तारीख, इतिहास, उत्पत्ति, छठ पूजा की कथा :

Chhath Vrat & Pooja Vidhi in Hindi : सूर्य देव के पूजन और अटूट आस्था का पर्व छठ की शुरुआत रविवार, 11 नवंबर 2018, को नहाने और खाने से हो जाएगी। सोमवार, 12 नवंबर 2018, को छोटी छठ (खरना) के साथ 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा। मंगलवार, 13 नवंबर 2018 – डाला छठ अस्ताचल सूर्य को पहला अर्घ्य का दिन है । इसे संध्या पूजा के रूप में भी जाना जाता है। बुद्धवार, 14 नवंबर 2018 की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ पारन या उपवास के पूरा होने का दिन है।

Chhath puja in Hindi
Chhath puja in Hindi

छठ (छठी मइया) व्रत पूजा विधि और कहानी (Chhath Maiya Vrat & Pooja Vidhi in Hindi)

छठ भगवान सूर्य की उपासना के लिए समर्पित व्रत है । इसे सूर्य षष्ठी डाला छठ या स्कंद षष्ठी पूजा भी कहा जाता है। पूर्वांचल और बिहार में अनिवार्य रूप से लोग छठ मनाते हैं, बिहार में मुख्य छठ पूजा का आयोजन दिवाली से भी बड़ा होता है।

हिन्दू पंचांग के अनुसार छठ कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से सप्तमी तक लोगों द्वारा बेहद उत्सुकता से मनाया जाने वाला एक महापर्व है। पहले यह त्यौहार सिर्फ पूर्वांचल के हिन्दू धर्म में मनाया जाता था लेकिन इस समय छठ पर्व देश के हर कोने में लोगों के द्वारा मनाया जाने वाला एक बड़ा और मुख्य त्यौहार बन गया है ।

‘कार्तिक छठी देवी व्रत’ को ‘‘सूर्य षष्ठी डाला व्रत‘ भी कहा जाता है। इस व्रत को जो कोई सद्भावना पूर्वक करता है एवं रात के समय छठी देवी के गीत गाता है और व्रत कथा पढता है अथवा सुनता है और दूसरों को भी सुनाता है तो छठी देवी उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करती है, और उसकी सदैव रक्षा होती है । ऐसी मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए इस व्रत को किया जाता है |

छठ व्रत को घर का कोई भी स्त्री या पुरुष सदस्य कर सकता है । स्त्री और पुरुष समान रूप से अंत:करण की पवित्रता के लिए सूर्य को धन्यवाद देने के लिए ये त्यौहार मनाते हैं। लोग बड़े उत्साह से उदित सूर्य को नमन करने से पूर्व ढ़लते सूर्य को प्रणाम करते हैं और अपने संतान सुख, परिवार के सदस्यों के खुशहाल जीवन के लिए सफलता व समृद्धि  के लिए कामना करती हैं। 

छठ व्रत विधि (Chhath Vrat Vidhi in Hindi)

माता छठ का व्रत करने के सही नियम इस प्रकार से है –

महापर्व का पहला दिन खाए नहाय : इसके पहले दिन नहाने खाने की विधि होती है। जिसमें घर, देह और अन्त:करण की शुद्धि के बाद व्रती सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं और इस दिन को ही ही ‘नहाय – खाय’ के नाम से पुकारते हैं। इससे ऐसा लगता है कि लोक उत्सव संदेश दे रहा है कि खाने से पहले नहाना कितना जरुरी होता है।

दूसरा दिन खरना‘ (छोटी छठ) : दूसरे दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रती दिनभर उपवास रखने के बाद गन्ने के रस में बनी खीर खाकर अपने उपवास को पूर्णता देते हैं। इसलिए इसे ‘खरना’ कहते हैं। व्रती यह दिन भी पवित्र आचरण और ईश्वर आराधना में बिताते हैं।

छठ व्रत का तीसरा दिन मुख्य पूजा : तीसरा दिन अर्थात छठी माता का दिन। यह पर्व का सबसे अहम दिन होता है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी इस पर्व का उत्कर्ष होता है। शाम होते छठी देवी के गीतों के साथ पति या बेटा सिर पर बास की टोकरी में सभी मौसमी फल और अन्य सामग्री रखकर घाट तक जाते है इसमें अधिकतर घरों में बने विविध पकवान, फल, फूल और पूजन सामग्री सूप में सजाकर रखी होती है | महिलाएं सूप में जलते दीपक और गंगाजल के साथ छठ गीतों के संग पीछे – पीछे पवित्र जल स्रोत की ओर चल पड़ती हैं।

चौथा दिन उदित सूर्य को अर्घ्य : चौथे और अंतिम दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल सप्तमी को उदित सूर्य अर्घ्य पाते हैं और व्रती अपने घरों की ओर चल पड़ते हैं। कच्चे दूध को पीकर व्रत पूर्ण होता है। इसी के साथ एक उत्सव विदा लेता है, लेकिन लोक जीवन में वे सारे संदेश स्थापित कर देता है, जो मनुष्य को मनुष्य बनाते है।

छठ पूजा विधि (Chhath Puja Vidhi in Hindi)

माता छठ का पूजा करने का सही नियम इस प्रकार से है –

छठ पूजा व्रत चार दिन तक किया जाता है। इस 4 दिवसीय सूर्यषष्ठी व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इस तिथि को उपवास रखे जाने के कारण इस व्रत का नाम छठ व्रत पड़ा है। छठ पूजा अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर सप्तमी के सूर्योदय की प्रतीक्षा का भी पर्व है जो पूजा का चौथा और अंतिम दिन होता है।

इस पूजा का आरंभ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होता है | लोगों में इस पर्व को लेकर बहुत उत्साह रहता है । इनके उत्साह का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे किसी भी गलती के लिए कोई भी जगह नहीं छोड़ते । घर की साफ – सफाई के साथ तन और मन की शुद्धता का भी पूरा ख्याल रखते हैं ।

नहाय खाय से इसकी शुरुआत होती है, जिसमें छोटी छठ (खरना) से 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है और सप्तमी के दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत समाप्त होता है। इस दिन जल्दी उठकर पवित्र जल से स्नान करके पूरे दिन उपवास करने का रिवाज है। यहाँ तक कि महिलाएं अन्न तो दूर पानी भी नहीं ग्रहण करती हैं |

सूप से लेकर फल और गन्ने से लेकर कच्ची हल्दी तक पूजन की सामग्री छठ में प्रयोग होती है। परिवार में जितने सदस्य होते हैं उतने सूप और फलों को छठी मइया को अर्पित किया जाता है। गाय का दूध, गन्ना, सिंघाड़ा, संतरा, सेब, मूली, नींबू, कच्ची हल्दी व चावल का बना लड्डू और रक्षा सूत्र के पुरोहित व पूज्यनीय विधि विधान से पूजा करते हैं।

इसमें नंगे पैर घाट तक महिलाएं व पुरुष जाते हैं और उनके किनारे मिट्टी की बनी ‘सुसुबिता’ (छठी मइया का प्रतीक) की विधि विधान से पूजा की जाती है | महिलाएं पानी में खड़े होकर अस्ताचलगामी, उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर संतान सुख व परिवार की समृद्धि की कामना करतीं हैं। 

छठ व्रत में एक विशेष बातों का ध्यान रखना बेहद जरुरी होता है कि महिलाएं ऐसी धोती या साड़ी बिलकुल न पहने जिसमे काले रंग का प्रयोग हो।

छठ पूजा में छठी मइया की उपासना की कथा   

सूर्य उपासना और छठी मैया की पूजा के लिए चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व का इतिहास बहुत प्राचीन है। भारतीय शास्त्रों और पुराणों में ऐसी कई कथाएं हैं जिसमें मां षष्ठी संग सूर्य देव की पूजा का उपाख्यान मिलता हैं। इस परम्परा में प्रचलित कुछ कथाएं  है :

कहानी 1 

शिव पुराण रूद्र संहिता में ऐसा उपाख्यान मिलता है कि भगवान शिव के तेज से छह मुख वाले बालक का जन्म इसी दिन हुआ था, जिसका पालन – पोषण छह कर्तिकाओं (तपस्विनी नारी) ने किया, जिससे वह बालक ‘कार्तिकेय’ नाम से विख्यात हुआ। कर्तिकाएं कार्तिकेय की माता कहलाईं। यह छह कर्तिकाएं ही षष्ठी माता या छठी मइया कहलाती हैं।

कहानी 2

देवी भागवत पुराण के अनुसार, स्वयंभू मनु के संतानहीन पुत्र प्रियव्रत को जब मणियुक्त विमान से आती हुई एक देवी के दर्शन हुए, तो देवी ने बतलाया कि वह ब्रह्माजी की मानस पुत्री हैं, और स्वामी कार्तिकेय की पत्नी हैं। मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण वे षष्ठी देवी कहलाईं।

कहानी 3

तीसरी कथा महाभारत वनपर्व में मिलती है। कपट-द्यूत से हारकर पांचों पांडव जब वनवास में रहने लगे, तो अन्न की कमी से बचने के लिए युधिष्ठिर को धौम्य ऋषि ने सूर्य के 108 नामों से उनकी उपासना करने का परामर्श दिया। इसके बाद भगवान भास्कर ने प्रकट होकर उन्हें एक ताम्रपात्र दिया और कहा कि जब तक महारानी द्रौपदी इस पात्र में भोजन नहीं करेंगी, तब तक इसमें स्थित भोज्य पदार्थ की कमी नहीं होगी। इसके पश्चात महारानी द्रौपदी षष्ठी तिथि के दिन उपासना करने लगी। फलस्वरूप पांडवों को उनका खोया हुआ राजपाट वापस मिल गया।

वैज्ञानिक स्तर पर भी छठी मइया की व्याख्या की गई है। जगत के समस्त जड़ – चेतन वर्ग सूर्य की रश्मियों से ही जीवन धारण करते हैं। सूर्य की रश्मियों में छह अप्रतिम शक्तियां विद्यमान हैं। ये हैं – दहनी, पचनी, धुम्रा, कर्षिणी, वर्षिणी, आकर्षण करने वाली, लोहित करने वाली, वर्षा करने वाली। भगवान सूर्य की ये छह शक्तियां ही छठी मइया कहलाती हैं।

छठ पूजा में सूर्य उपासना की महिमा और कथा

कुंती-कर्ण कथा

कहते हैं कि कुंती जब कुंवारी थीं तब उन्होंने ऋषि दुर्वासा के वरदान का सत्य जानने के लिए सूर्य का आह्वान किया और पुत्र की इच्छा जताई। कुंवारी कुंती को सूर्य ने कर्ण जैसा पराक्रमी और दानवीर पुत्र दिया. एक मान्यता ये भी है कि कर्ण की तरह ही पराक्रमी पुत्र के लिए सूर्य की आराधना का नाम है छठ पर्व

राम की सूर्यपूजा की कथा 

कहते हैं सूर्य और षष्ठी मां की उपासना का ये पर्व त्रेता युग में शुरू हुआ था। भगवान राम जब लंका पर विजय प्राप्त कर रावण का वध करके अयोध्या लौटे तो उन्होंने कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को सूर्यदेव की उपासना की और उनसे आशीर्वाद मांगा। जब खुद भगवा, सूर्यदेव की उपासना करें तो भला उनकी प्रजा कैसे पीछे रह सकती थी। राम को देखकर सबने षष्ठी का व्रत रखना और पूजा करना शुरू कर दिया। कहते हैं उसी दिन से भक्त षष्ठी यानी छठ का पर्व मनाते हैं।

राजा प्रियव्रत की कथा

छठ पूजा से जुड़ी एक और मान्यता है। एक बार एक राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रयेष्टि यज्ञ कराया. लेकिन उनकी संतान पैदा होते ही इस दुनिया को छोड़कर चली गई। संतान की मौत से दुखी प्रियव्रत आत्महत्या करने चले गए तो षष्ठी देवी ने प्रकट होकर उन्हें कहा कि अगर तुम मेरी पूजा करो तो तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी। राजा ने षष्ठी देवी की पूजा की जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं इसके बाद से ही छठ पूजा की जाती है.

भारतीय शास्त्रों में इस पर्व को जिस भी कथा से जोड़ा जायें, लेकिन इस पर्व का मूल स्वर तो लोक मंगल ही है। इसलिए यह पर्व जन जन को जोड़ता है और धर्म को भी शास्त्र की दुरूह प्रक्रियाओं से मुक्त कर सर्व जन को यह अधिकार देता है कि वे अपने पुरोहित स्वयं बने। इसलिए इस व्रत का साधक स्वयं पुरोहित भी है और प्रेरणा भी।

इस त्योहार में हम स्वच्छता पर जोर देते हुए अंतस की पवित्रता की ओर बढ़ते हैं। निराहार रहकर हम आत्मविश्वास का साक्षत्कार करते हैं। आगे हम आत्मउत्थान को सर्व में बांट देने का संकल्प लेते हैं। यही संकल्प उपासना को उत्सव में बदल देता है। इसकी महिमा के बारे में सहज बखान तो नहीं किया जा सकता है। क्योंकि इसका आधार सर्व मंगलकारणी सर्व मांगल्य धारणी जन-जन के हृदय में विराजने वाली छठी मइया हैं।

Chhath Puja in Hindi के इस प्रेरणादायी लेख के साथ हम चाहते है कि हमारे  Facebook Page को भी पसंद करे | और हाँ यदि future posts सीधे अपने inbox में पाना चाहते है तो इसके लिए आप हमारी email subscription भी ले सकते है जो बिलकुल मुफ्त है |

4 thoughts on “छठ 2018 – छठ व्रत विधि और पूजा विधि (Chhath Maiya Vrat & Pooja Vidhi in Hindi)”

  1. Whatever may be the actual historical reason behind celebration of this festival , today its our core value which is our tradition.

    We respect all the core reason behind it and we worship sun and nature which are main source of enery on this earth.

  2. आपका रचना कल 12-10-2108 को साप्ताहिक मुखरित मौन मे

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *