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दिवाली पर निबन्ध – Diwali Essay in Hindi – Khayalrakhe.com

Diwali Essay in Hindi : प्रस्तावना – यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि हमारा देश त्योहारों का देश है। शायद ही कोई ऐसा दिन हो जब यहाँ कोई-न-कोई त्योहारों न हो और दीपावली तो है ही खुशियों का त्योहार। भारत में यह हिन्दुओं द्वारा मनाया जाने वाला सबसे बड़ा त्योहार है।

दिवाली के इस खास उत्सव को मनाने के पीछे एक बहुत बड़ा उद्देश्य भी हैं। वर्षा ऋतु के पश्चात कार्तिक मास में यह पर्व आता है। वर्षा ऋतु में वर्षा के कारण अनेक प्रकार के कीटाणु आदि पैदा हो जाते हैं। इसलिए इस समय अपने आसपास की जगहों में सफाई, रंग-रोगन करने की सबसे अधिक आवश्यकता होती है जिससे की कीटाणुओं का नाश हो जाएं। दिवाली पर्व से कीटाणुओं को नाश करने में बहुत सहायता मिलती है। इसलिए दीपावली को स्वच्छता का पर्व भी कहते है।

ब्रह्मपुराण के अनुसार – दीपावली की इस अँधेरी रात अर्थात अर्द्धरात्रि में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक में आती हैं और प्रत्येक सद्गृहस्थ के घर में विचरण करती हैं। जो घर हर प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध और सुन्दर तरीके से सुसज्जित एवं प्रकाशयुक्त होता है, वहाँ अंश रूप में ठहर जाती हैं और गंदे स्थानों की तरफ वह देखती भी नहीं। इसलिए दीपावली आने से कई दिन पूर्व से ही लोग अपने – अपने घरों व दुकानों को साफ करना और सजाना शुरू कर देते हैं।

Diwali Essay in Hindi
हिंदी में दिवाली पर लंबा और छोटा निबंध

दीपावली त्योहार पर निबन्ध – Diwali Essay in Hindi

आपने लोगों को देखा भी होगा कि कैसे दिवाली आते ही रंगाई और पुताई के बाद साधारण घर भी अपनी युवावस्था में आकर मुस्कराने लगते हैं। दरवाजों, रोशनदानों पर तरह-तरह के रंग – रोगन किये जाते हैं। नये बर्तन खरीदने को तो आज के दिन गृहिणियां मचल उठती है।

दिवाली कब मनाई जाती है ?

दीपावली या दिवाली अर्थात “प्रकाश का पर्व” को शरद ऋतु (कार्तिक मास की अमावस्या) में हर साल मनाने की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही हैं। हिन्दू धर्म के इस सबसे बड़े और प्रतिभाशाली त्योहार में पूरा देश असंख्य दीपों और लड़ियों से जगमगाता है। अत: इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। यह अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व है । यह पर्व अधिकतर ग्रिग्रेरियन कैलेंडर के अनुसार अक्टूबर या नवम्बर महीने में पड़ता है ।

दिवाली त्योहार का महत्व Importance of Diwali festival in Hindi 

भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में दिवापाली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्व है । इसकी लोकप्रियता, व्यापकता तथा महत्ता भारतीय व्रत एवं त्यौहारों में सबसे अधिक है। देशभर में इस त्यौहार को लगभग सभी जातियाँ बहुत ही उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाती हैं किन्तु ये हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है।

दिवाली के इस खास उत्सव को मनाने के लिये हिन्दू धर्म के लोग बेहद उत्सुकता पूर्वक दशहरे के दिनों से ही इन्तजार  करते है। इनके उत्साह का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ये इस त्योहार के आने से पहले ही अपने घरों को साफ-सुथरा कर सजाना शुरू कर देते हैं। घरों में सफेदी कराते हैं। इनका मानना है कि इससे जीवन में स्वच्छता और सफाई को महत्व मिलता है।

दिवाली मनाने का कारण Reason for celebrating Diwali in Hindi

माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के बाद और रावण पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् अयोध्या लौटे थे। राम के अयोध्या आने पर अयोध्यावासियों का हृदय अपने परमप्रिय राजा के लौटने से खुश हो उठा था। अपने खुशी का इजहार करने के लिए अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि अनेक दीपकों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारत भर में इस विलक्षण पल को दीपावली पर्व के रूप में मनाया जाता है।

दिवाली कैसे मनाया जाता है ?

इस दिन संध्या होते ही प्रत्येक नगर व ग्राम में घर – घर में दीपकों का प्रकाश जगमगा उठता है। पहले दीपावली पर केवल सरसों के तेल भरे दीपों को ही जलाया जाता था और दीपावली का वास्तविक आनन्द इन्हीं दीपों के पंक्तिबद्ध प्रकाश में था। परन्तु आज के विज्ञान ने प्रकाश के अनेक अद्भुत साधन (असंख्य कंडीले, मोमबत्तियां, रंगीन बल्ब, दीप माला) समाज को प्रदान किये हैं जो अपने उज्ज्वल प्रकाश से अमावस्या के अंधकार को शरद पूर्णिमा में बदल देता है। अचानक प्रकाश, चिंगारियां उत्सर्जित होना, तेज आवाज होना और अलग – अलग रंग की रोशनियों का निकलना इसे देखना काफी अद्भुत लगता है | ऐसा प्रतीत होना है कि हम किसी और दुनिया में आ गए हों | 

आलोक पर्व दीपावली के साथ हमारी अनेक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा धार्मिक परम्पराएँ भी जुड़ी हैं। वास्तव में धनतेरस, नरक चतुर्दशी तथा महालक्ष्मी पूजन इन तीनों पर्वों का मिश्रण है दीपावली। दीपावली की शुरुआत धनतेरस से ही आरंभ हो जाती है। इस दिन से लोग अपने घर के द्वारों पर दीये जलाना आरंभ कर देते हैं, और दीप जलाने की ये प्रथा देवप्रबोधिनी एकादशी तक चलता हैं।

दिवाली से पहले धनतेरस के दिन बरतनों को या किसी भी धातु को खरीदना शुभ माना जाता है । बरतन खरीदकर लोग उनकी पूजा करते हैं इसी वजह से इस दिन दुकानों में बहुत भीड़ रहती है। 

कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वंतरि भगवान का जन्म हुआ था, इसलिए इस तिथि को ‘धनतेरस’ के नाम से जाना जाता है। धन्वंतरि भगवान औषधियों के ज्ञाता हैं, आयुर्वेद का सम्पूर्ण ज्ञान इन्हें है। अत: इनसे स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना की जाती है।

अगले दिन नरक चतुर्दशी जिसे छोटी दिवाली भी कहते है, के दिन सूर्योदय के पूर्व स्नान करना बहुत शुभ माना जाता है और रात्रि में यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। पौराणिक कथा है कि इसी दिन योगिराज श्रीकृष्ण ने एक दैत्य नरकासुर का संहार किया था। वह एक लोक प्रपीड़क, नृशंस राक्षस था। उसके वध से भी जनता में अपार प्रसन्नता फैली। उसने अनेक राजाओं को पराजित करके उनकी कन्याओं का अपहरण करके अपने बंदीगृह में डाल दिया था, श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ जाकर और उसे परास्त करके सभी कन्याओं को मुक्त कराया था। अत: नरकासुर के आतंक से मुक्ति की खुशी में भी दिवाली पर्व को मनाते हैं।

बंगाल में यह धार्मिक मान्यता है कि दीपावली-अमावस्या से पितरों की रात्रि आरंभ होती है। कहीं वे मार्ग में भटक न जाएँ, इसलिए उनके लिए प्रकाश की व्यवस्था के रूप में दीयों को जलाया जाता है  जबकि इस पर्व को मनाने के पीछे अन्य मान्यताएँ भी हैं । त्रेता युग में लंका विजय के बाद राम जब अयोध्या लौटे थे, तब नगरवासियों ने उनके स्वागत में घी के दिये जलाए थे । उस दिन उन्होंने खूब खुशियाँ मनायीं। हर घर में  अच्छे – अच्छे पकवान बने, रात्रि में अयोध्या वासियों ने नगर भर में दीप जलाये। तभी से राम के अयोध्या  में लौटने एवं रामराज्य के प्रारम्भ होने की तथा पाप के ऊपर पुण्य की विजय की पुनीत स्मृति में ही यह उत्सव भारत में प्रति वर्ष मनाया जाने लगा।

वामनावतार विष्णु की कथा भी दीपावली से जोड़ी जाती है। इसी दिन राजा बलि की दान शीलता देखकर देवलोक कम्पित हो उठा, और देवताओं ने राजा बलि की परीक्षा के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की। राजा बलि की परीक्षा लेने के लिए भगवान उनसे तीन पग वसुधा की याचना की। वामनावतार विष्णु ने तीन पग में तीनों लोको को ही नाप लिया। और तभी बलि के भूदान से प्रसन्न होकर यह वरदान भी दिया कि भूलोकवासी उसकी स्मृति में दीपावली का पवित्र उत्सव मनाया करेंगे।

दिवाली की एक और कथा महाकाली की पूजा से सम्बन्धित है। असुरों का वध करने के पश्चात् भी जब महामाया दुर्गा का क्रोध शान्त नहीं हुआ और वह संसार का संहार करने के लिए उद्यत हो गई तब समस्त संसार में हाहाकार मच गया। संसार की रक्षा के लिए शंकर स्वयं उनके चरणों में जाकर लेट गए। क्रोधोन्मत्त महामाया इनके वक्षस्थल पर सवार हो गई। शिव के तपोमय शरीर के स्पर्शमात्र से ही महाकाली का क्रोध शान्त हो गया और संसार संहार से बच गया। जनश्रुति है कि इसी प्रसन्नता में दीपावली का उत्सव मनाया जाता है।

दीपावली के सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध मान्यता है कि यह मूलतः यक्षों का उत्सव है। दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ उत्सव मनाते हैं। इस दिन जो मनोरंजन के विविध कार्यक्रम होते हैं, वे यक्षों की ही देन हैं। सभ्यता के विकास के साथ यह त्योहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर के बजाय धन की देवी लक्ष्मी जी की इस अवसर पर पूजा होने लगी; क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी, पर लक्ष्मी जी की मान्यता देव तथा मानव जातियों, दोनों में थी।

माता लक्ष्मी केवल धन की स्वामिनी ही नहीं, वरण ऐश्वर्य एवं सुख – समृद्धि की भी स्वामिनी मानी जाती हैं। अत: लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की भी पूजा प्रारंभ हो गई। दीपावली के दिन ‘शुभ – लाभ’ शब्दों का प्रयोग बहुतायत से किया जाता है। लोग अपने घरों में इसे लिखते हैं। इसमें ‘शुभ’ शब्द भगवान् गणेश का प्रतीक और ‘लाभ’ शब्द माता लक्ष्मी का प्रतीक है।

दीवावली के इन धार्मिक महत्वो के अतिरिक्त कुछ ऐतिहासिक महापुरुषों की जन्म-मरण की तिथियाँ भी इस पर्व से सम्बन्धित हैं। स्वामी शंकराचार्य का निर्जीव शरीर जब चिता पर रख दिया गया तब सहसा उनके शरीर में इसी दिन पुनः प्राण संचार हुआ। रोती हुई आँखे फिर से हंसने लगीं, घर – घर खुशियाँ मनाई जाने लगीं।

जैन मतावलम्बी भी दीपावली को 24वें तीर्थकर श्री महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस मानकर मनाते हैं। आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द का निर्वाण भी आज के दिन ही हुआ था तथा स्वामी रामतीर्थ की जन्म एवं निधन तिथि भी दीपावली है। अत: भारतीय आज के दिन महापुरुषों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

इन धार्मिक तथा ऐतिहासिक कारणों के अतिरिक्त इसका एक प्रमुख सामाजिक कारण भी है। भारतवर्ष  कृषि – प्रधान देश है। यहाँ की रोजी रोटी का मुख्य साधन खेती ही है। इसलिए जब किसानो के खेतों में फैला हुआ फसल सही सलामत घर में आ जाता था तब होली और दीपावली के त्योहार मनाये जाते थे। जब रबी की फसल तैयार हो जाती तब होली मनाई जाती थी और जब खरीफ की फसल तैयार हो जाती तब दीपावली का उत्सव मनाया जाता था।

खेतों में फसल कटकर जब घर आ जाती तब किसान फूला नहीं समाता और अपने हृदय के ख़ुशी को अगणित दीप जलाकर प्रकट करता, सूखी रोटियों के स्थान पर उस दिन वह पूरी खाता तथा अपने इष्टदेव की पूजा करता है।

दीपावली के दिन व्यापारी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। उनका विश्वास है कि आज हमारे यहाँ लक्ष्मी जी आयेंगी। पुराने बहीखाते बदल दिये जाते हैं और नये प्रारम्भ किये जाते हैं। दीपावली से ही व्यापारी वर्ग का नया वर्ष प्रारम्भ होता है।

दीपावली के ठीक दूसरे दिन ‘कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा’ के दिन अन्नकूट पर्व मनाया जाता है। इस दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। यही वह दिन है, जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को मूसलाधार वर्षा से बचाने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी ऊँगली पर उठाकर रखा था, और इस तरह उन्होंने इंद्र के अभिमान को चूर करके उसकी पूजा बंद कराकर गोवर्धन की पूजा का आरम्भ कराया था और गोकुलवासियों ने धूमधाम के साथ गोवर्धन पर्वत की पूजा करके उत्सव मनाया था।

कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन ‘भाई-दूज का पर्व मनाया जाता हैं। इस तरह दीपावली पर्व के ये पांच दिन बहुत विशेष हैं और सभी इन पर्वों की प्रतीक्षा करते हैं, स्वागत करते हैं। दीपावली का पर्व आनंद -उत्साह का पर्व है, लेकिन मूल रूप से यह दीपों की रोशनी का उत्सव है, जिसकी जगह रंग – बिरंगे बिजली के बल्ब कभी नहीं ले सकते। मिट्टी के दीये में तेल डालकर रुई की बाती बनाकर दीये जलाए जाने की हमारी लोक-परम्परा आज भी अपनी लोक-संस्कृति को आलोकित करती है, जिसके माध्यम से वातावरण में छाया हुआ घना अँधेरा एवं हानिकारक जीवाणुओं एवं कीटों का शमन होता है।

दीपावली अपने थोड़े से प्रकाश से ही अँधेरे का संहार करती है, देखने में तो जलता हुआ दीया बहुत छोटा सा दीखता है, लेकिन उसके समक्ष-समीप कोई भी ज्यादा देर तक ठहर नहीं सकता, अन्यथा वह जल जाएगा और उससे निकलने वाला प्रकाश दूर तक उजाला फैलाता है, अपनी सुगंध बांटता है, अपने अस्तित्व का बोध कराता है। जलता हुआ प्रत्येक दीया यह प्रेरणा देता है कि ज्ञान व सतोगुण के प्रसार की प्रतियोगिता में तमोगुण और अज्ञानता का अस्तित्व नहीं रह सकता। अँधेरे के आश्रय में ही जघन्यता पापकर्म किए जाते हैं। अँधेरे के आश्रय में ही अज्ञान फलता-फूलता है और अपनी अज्ञानता के साम्राज्य को बढ़ाता है, लेकिन विवेक का प्रकाश इस अज्ञानयुक्त अंधकार को एक पल में दूर कर देता है।

कुछ लोग इस पवित्र पर्व दिवाली के अवसर पर जुआ खेलते हैं और शराब पीते हैं ।उनका विश्वास है कि इस दिन जीत जाने से भविष्य में सदा विजय ही मिलेगी । वे भूल जाते हैं कि ‘जुआ खेलना’ बहुत हानिकारक है । इससे कई बार घर तबाह हो जाता है । अत: इस कुविचार और कुप्रथा को समूल नष्ट करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए ।

आइए इस बार हम शुभ संकल्प करें कि इस दिवाली पर समाज में फैले हुए अज्ञानतारूपी अन्धकार से उपजी कुप्रवृतियों, रुढ़िवादियों और कुपराम्पराओं को विवेकरूपी दीये के उजाले से दूर करेंगे और अपने समाज में स्वस्थ परमपराओं को आश्रय देंगे। इस दिन अनावश्यक आतिशबाजी व पटाखों का प्रयोग न करके शान्तिपूर्वक प्रकाश का आगमन अपने घर – परिवार व अंतर्मन के जगत में करेंगे।

Diwali में कुछ सावधानियां 

  • पटाखों को किसी खुली जगह पर ही जलाएं |
  • पटाखों को दूर से ही जलाए | बेहतर होगा कि किसी लम्बे डंडे में मोमबत्ती या अगरबत्ती बांध कर पटाखों को जलाएं |
  • बच्चो को अकेले पटाखे न जलाने दे |
  • किसी अकस्मात घटना के समय उपयोग करने हेतु 2-3 बाल्टी पानी का इन्तेजाम रखे |

Essay on Diwali in Hindi / दिवाली के महत्व पर विस्तृत निबन्ध के इस प्रेरणादायी लेख के साथ हम चाहते है कि हमारे Facebook Page को भी पसंद करे | और हाँ यदि future posts सीधे अपने inbox में पाना चाहते है तो इसके लिए आप हमारी email subscription भी ले सकते है जो बिलकुल मुफ्त है |

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