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दीपावली/दिवाली पर निबन्ध – Diwali Essay in Hindi – Khayalrakhe

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दीपावली/दिवाली पर निबंध – Diwali/Deepawali Essay in Hindi

Deepawali Essay in Hindi
Deepawali Essay in Hindi

दिवाली – रोशनी का शुभ त्यौहार दीपावली – Diwali/Deepawali Essay in Hindi

Essay on Diwali or Deepawali in Hindi – दीपावली अथवा दिवाली, हिन्दू कलैन्डर का एक बहुत ही लोकप्रिय त्योहार है । यह चराग-या रोशनी का त्योहार है  शब्द “दीपावली” का शाब्दिक अर्थ है ‘दीपकों की पंक्ति’ । इस दिन मिट्टी के दीप जलाने के रिवाज के कारण ही दीपावली को दीपोत्सव अथवा प्रकाश पर्व भी कहते हैं। यह दीपावली त्योहार की एक बहुत पवित्र और पावन परंपरा है । दीपावली को भगवान राम के 14 वर्ष के बनवास के बाद अपने राज्य में वापस लौटने की स्मृति में मनाया जाता है ।

दिवाली का त्योहार पूरे भारत में बहुत ही हर्सोल्लास के साथ मनाया जाता है । यहाँ के हिन्दुओं का यह सबसे प्रमुख त्योहार है । सिख व जैन धर्म के अनुयायी भी इसे मनाते है । दीपावली के साथ  पाँच दिवसीय त्योहार धनतेरस, नरकचतुर्थी, दिवाली, गोबर्धन पूजा व भाईदूज के जुड़ जाने से इस पर्व की प्रसन्नता और आनंद पांच गुना और बढ़ जाते हैं ।

दिवाली कब मनाई जाती है ?

पूरे संसार में हिन्दू प्रतिवर्ष शरद ऋतु में प्राचीन परम्परागत तरीके से दीपावली का त्योहार मनाते हैं। हिन्दू कलैंडर के अनुसार यह कार्तिक मास के पंद्रहवे दिन मनाई जाती है। यह दशहरे से ठीक बीस दिन बाद होती है । यह पर्व अधिकतर ग्रिग्रेरियन कैलेंडर के अनुसार अक्टूबर या नवम्बर महीने में पड़ता है । 

पांच दिवसीय दिवाली की पूजा और महत्व – Importance of Deepawali festival in Hindi 

हमारी भारतीय सभ्यता में अधिकतर त्योहार मनुष्य के अध्यात्मिक व सांस्कृतिक बृद्धि के लिए बनाए गए है । इनमें पूजा पाठ पर अधिक बल दिया जाता है । दीपावली के साथ भी हमारी अनेक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा धार्मिक परम्पराएँ भी जुड़ी हैं। वास्तव में पांच दिवसीय त्योहार दीपावली धनतेरस, नरकचतुर्थी, दिवाली, गोबर्धन पूजा व भाईदूज इन पर्वों का मिश्रण है।

दीपावली धनतेरस से ही आरंभ हो जाती है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वंतरि भगवान का जन्म हुआ था, इसलिए इस तिथि को ‘धनतेरस’ के नाम से जाना जाता है। धन्वंतरि भगवान औषधियों के ज्ञाता हैं, आयुर्वेद का सम्पूर्ण ज्ञान इन्हें है। अत: इनसे स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना की जाती है। 

प्राचीन काल से धनतेरस पर दीपदान की परम्परा चली आ रही है तथा घर से बुरी आत्माओं को दूर रखने के लिए सारी रात तेरह दीपक जलाकर रखे जाते है । इस दिन बर्तन, सोना, चाँदी व अन्य घरेलू सामान खरीदना शुभ माना जाता है ।

धनतेरस के बाद नरक चतुर्थी आती है, जोकि नरकासुर नामक राक्षस के बध से संबंध रखती है । इस दिन को छोटी दीपावली भी कहते है । नरकासुर भूदेवी का पुत्र था । उसने भगवान ब्रह्मा की तपस्या करके अनेक वरदान पा लिया था । वह अपनी शक्तियों का गलत प्रयोग करते हुए आतंक फ़ैलाने लगा था , जिसका भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से संहार किया ।

इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। भगवान श्रीकृष्ण और सत्यभामा की इस जीत की खुशी में दीपक जलाकर त्योहार मनाया गया । अब प्रतिवर्ष इसी जीत की स्मृति में यह त्योहार मनाया जाता है । नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली भी कहते है।

नरक चतुर्थी के बाद दीपावली का पवित्र दिन आता है । इस दिन अमावस्या होती है, इसलिए बुरी आत्माओं को भगाने के लिए दीपक जलाए जाते है । इस दिन ज्योति के महासागर में पूरा देश अनेक असंख्य दीपकों और लड़ियों से जगमगाता है । लोग अपनी खुशियों का इजहार पटाखों से भी करते है । चारों ओर उमंग और उल्लास की धूम होती है ।

इस दिन सुख, समृद्धि और वैभव के लिए पूजा की जाती है । देवी माता लक्ष्मी के अनेक रूप हैं । इन रूपों में से इनका एक धनलक्ष्मी स्वरूप “वैभवलक्ष्मी” हैं जिसकी पूजा – अर्चना दिवाली के दिन करने का विधान है । दिवाली फसल की परिपक्वता का भी सूचक है । आने वाले नये वर्ष की शुभकामनाएं व आशिर्वाद के लिए इन्हें पूजा जाता है । 

दिवाली का अगला दिन गोबर्धन पूजा के रूप में मनाया जाता है । गोवर्धन पूजा का पर्व कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की प्रतिपाद तिथि को मनाया जाता है। इस दिन वर्षा को बाढ़ का रूप लेते देख सभी ब्रज के निवासी को भगवान कृष्ण ने भारी वर्षा व तूफान से बचाया था
भगवान् श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को मूसलाधार वर्षा से बचाने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी ऊँगली पर उठाकर रखा था, और इस तरह उन्होंने इंद्र के अभिमान को चूर करके उसकी पूजा बंद कराकर गोवर्धन की पूजा का आरम्भ कराया था और गोकुलवासियों ने धूमधाम के साथ गोवर्धन पर्वत की पूजा करके उत्सव मनाया था। इस दिन ब्रज के निवासियों को एहसास हुआ कि कृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। 
दिवाली का पांचवा व अंतिम दिन भाई दूज के रूप में मनाया जाता है ।  इस दिन बहने अपने भाइयों को तिलक करके, उनके शुभ कल्याण की कमाना करती हैं । इस प्रकार पांचो दिन के ये उत्सव हमारे जीवन में सुख, समृद्धि और सम्पन्नता लाते है । 
दिवाली मनाने का कारण और कथा – Reason for celebrating Deepawali in Hindi

पौराणिक कथा है कि इसी दिन योगिराज श्रीकृष्ण ने एक दैत्य नरकासुर का संहार किया था। वह एक लोक प्रपीड़क, नृशंस राक्षस था। उसके वध से भी जनता में अपार प्रसन्नता फैली। उसने अनेक राजाओं को पराजित करके उनकी कन्याओं का अपहरण करके अपने बंदीगृह में डाल दिया था, श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ जाकर और उसे परास्त करके सभी कन्याओं को मुक्त कराया था। अत: नरकासुर के आतंक से मुक्ति की खुशी में भी दिवाली पर्व को मनाते हैं।

बंगाल में यह धार्मिक मान्यता है कि दीपावली-अमावस्या से पितरों की रात्रि आरंभ होती है। कहीं वे मार्ग में भटक न जाएँ, इसलिए उनके लिए प्रकाश की व्यवस्था के रूप में दीयों को जलाया जाता है ।

सबसे प्रसिद्ध मान्यता माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के बाद और रावण पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् अयोध्या लौटे थे। राम के अयोध्या आने पर अयोध्यावासियों का हृदय अपने परमप्रिय राजा के लौटने से खुश हो उठा था। अपने खुशी का इजहार करने के लिए अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि अनेक दीपकों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारत भर में इस विलक्षण पल को दीपावली पर्व के रूप में मनाया जाता है।

वामनावतार विष्णु की कथा भी दीपावली से जोड़ी जाती है। इसी दिन राजा बलि की दान शीलता देखकर देवलोक कम्पित हो उठा, और देवताओं ने राजा बलि की परीक्षा के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की। राजा बलि की परीक्षा लेने के लिए भगवान उनसे तीन पग वसुधा की याचना की। वामनावतार विष्णु ने तीन पग में तीनों लोको को ही नाप लिया। और तभी बलि के भूदान से प्रसन्न होकर यह वरदान भी दिया कि भूलोकवासी उसकी स्मृति में दीपावली का पवित्र उत्सव मनाया करेंगे।

दिवाली की एक और कथा महाकाली की पूजा से सम्बन्धित है। असुरों का वध करने के पश्चात् भी जब महामाया दुर्गा का क्रोध शान्त नहीं हुआ और वह संसार का संहार करने के लिए उद्यत हो गई तब समस्त संसार में हाहाकार मच गया। संसार की रक्षा के लिए शंकर स्वयं उनके चरणों में जाकर लेट गए। क्रोधोन्मत्त महामाया इनके वक्षस्थल पर सवार हो गई। शिव के तपोमय शरीर के स्पर्शमात्र से ही महाकाली का क्रोध शान्त हो गया और संसार संहार से बच गया। जनश्रुति है कि इसी प्रसन्नता में दीपावली का उत्सव मनाया जाता है।

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दीपावली के सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध मान्यता है कि यह मूलतः यक्षों का उत्सव है। दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ उत्सव मनाते हैं। इस दिन जो मनोरंजन के विविध कार्यक्रम होते हैं, वे यक्षों की ही देन हैं। सभ्यता के विकास के साथ यह त्योहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर के बजाय धन की देवी लक्ष्मी जी की इस अवसर पर पूजा होने लगी; क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी, पर लक्ष्मी जी की मान्यता देव तथा मानव जातियों, दोनों में थी।

माता लक्ष्मी केवल धन की स्वामिनी ही नहीं, वरण ऐश्वर्य एवं सुख – समृद्धि की भी स्वामिनी मानी जाती हैं। अत: लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की भी पूजा प्रारंभ हो गई। दीपावली के दिन ‘शुभ – लाभ’ शब्दों का प्रयोग बहुतायत से किया जाता है। लोग अपने घरों में इसे लिखते हैं। इसमें ‘शुभ’ शब्द भगवान् गणेश का प्रतीक और ‘लाभ’ शब्द माता लक्ष्मी का प्रतीक है।

दीवावली के इन धार्मिक महत्वो के अतिरिक्त कुछ ऐतिहासिक महापुरुषों की जन्म-मरण की तिथियाँ भी इस पर्व से सम्बन्धित हैं। स्वामी शंकराचार्य का निर्जीव शरीर जब चिता पर रख दिया गया तब सहसा उनके शरीर में इसी दिन पुनः प्राण संचार हुआ। रोती हुई आँखे फिर से हंसने लगीं, घर – घर खुशियाँ मनाई जाने लगीं।

जैन मतावलम्बी भी दीपावली को 24वें तीर्थकर श्री महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस मानकर मनाते हैं। आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द का निर्वाण भी आज के दिन ही हुआ था तथा स्वामी रामतीर्थ की जन्म एवं निधन तिथि भी दीपावली है। अत: भारतीय आज के दिन महापुरुषों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

इन धार्मिक तथा ऐतिहासिक कारणों के अतिरिक्त इसका एक प्रमुख सामाजिक कारण भी है। भारतवर्ष  कृषि – प्रधान देश है। यहाँ की रोजी रोटी का मुख्य साधन खेती ही है। इसलिए जब किसानो के खेतों में फैला हुआ फसल सही सलामत घर में आ जाता था तब होली और दीपावली के त्योहार मनाये जाते थे। जब रबी की फसल तैयार हो जाती तब होली मनाई जाती थी और जब खरीफ की फसल तैयार हो जाती तब दीपावली का उत्सव मनाया जाता था।

खेतों में फसल कटकर जब घर आ जाती तब किसान फूला नहीं समाता और अपने हृदय के ख़ुशी को अगणित दीप जलाकर प्रकट करता, सूखी रोटियों के स्थान पर उस दिन वह पूरी खाता तथा अपने इष्टदेव की पूजा करता है।

दीपावली के दिन व्यापारी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। उनका विश्वास है कि आज हमारे यहाँ लक्ष्मी जी आयेंगी। पुराने बहीखाते बदल दिये जाते हैं और नये प्रारम्भ किये जाते हैं। दीपावली से ही व्यापारी वर्ग का नया वर्ष प्रारम्भ होता है।

कुछ लोग इस पवित्र पर्व दिवाली के अवसर पर जुआ खेलते हैं और शराब पीते हैं । उनका विश्वास है कि इस दिन जीत जाने से भविष्य में सदा विजय ही मिलेगी । वे भूल जाते हैं कि ‘जुआ खेलना’ बहुत हानिकारक है । इससे कई बार घर तबाह हो जाता है । अत: इस कुविचार और कुप्रथा को समूल नष्ट करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए ।

आइए इस बार हम शुभ संकल्प करें कि इस दिवाली पर समाज में फैले हुए अज्ञानतारूपी अन्धकार से उपजी कुप्रवृतियों, रुढ़िवादियों और कुपराम्पराओं को विवेकरूपी दीये के उजाले से दूर करेंगे और अपने समाज में स्वस्थ परमपराओं को आश्रय देंगे। इस दिन अनावश्यक आतिशबाजी व पटाखों का प्रयोग न करके शान्तिपूर्वक प्रकाश का आगमन अपने घर – परिवार व अंतर्मन के जगत में करेंगे।

Diwali में कुछ सावधानियां :

  • पटाखों को किसी खुली जगह पर ही जलाएं |
  • पटाखों को दूर से ही जलाए | बेहतर होगा कि किसी लम्बे डंडे में मोमबत्ती या अगरबत्ती बांध कर पटाखों को जलाएं |
  • बच्चो को अकेले पटाखे न जलाने दे |
  • किसी अकस्मात घटना के समय उपयोग करने हेतु 2-3 बाल्टी पानी का इन्तेजाम रखे |

विनम्र निवदेन – दोस्तों दिवाली हमारा सबसे बड़ा त्यौहार है। यह अंधेरे पर प्रकाश की विजय की बात करता है। इसके साथ कई अच्छी विचार – प्रक्रियाएं जुड़ी हुई हैं। लेकिन आज हमारा पर्यावरण इतना दूषित हो चुका है कि ठीक दीपावली से पहले देश के सर्वोच्च अदालत को पटाखे बेचने पर प्रतिबंध लगाने का आदेश पारित करना पड़ जाता है। समाज और इस दीपोत्सव की खुशियों को देखते हुए हमें याद रखना चाहिए कि यह त्यौहार बाहर रोशनी फैलाने के साथ – साथ हमारे अंत:करण को भी प्रकाशित करने का बढ़िया अवसर है। 

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