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नारी जीवन पर तीन प्रेरक कविता : Poem on Women / Nari in Hindi

Poem on Women Life in Hindi : नारी (Nari) पर तीन प्रेरक कविता

नारी जागरण से सम्बन्धित कोई परिवर्तन नारियों के लिए मुश्किल नहीं है लेकिन विडम्बना तो ये हैं कि हर युग में नारी शक्ति को बराबर का कहकर उसका शोषण ही हुआ है जबकि सच्चाई तो यह है कि युग कोई भी रहा हो स्त्री को अपनी शक्ति का प्रमाण देना पड़ा हैं |

यहां पर उपलब्ध “नारी जीवन पर कविता” केवल साधन के रूप में नहीं है बल्कि खुद नारी के अपने विचार और वेदना है जो कविता के भाव में अभिव्यक्ति हैं | आधुनिक नारी भले ही शिक्षित हैं, शक्तिशाली हैं, अत्याचारों से लड़ने वाली हैं, शोषण न सहने वाली हैं लेकिन सुनसान रास्तों पर अकेले जाने से नारी डरती हैं आखिर क्यों ? जब नारी में इतने गुण हैं तो क्यों न ऐसे समाज का निर्माण करें, जो नारी को यथोचित सम्मान दे | जिसकी स्त्री हमेशा से हकदार रही है |

नारी शोषण पर कविता “दर्द नारी का” – Hindi Poem ‘Nari Ka Shoshan’

Poem on Nari in hindi
Poem on Nari in hindi

नारी को कभी अपनों ने

तो कभी परायों ने

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तो कभी अजनबी सायों ने

तंग किया चलती राहों में

कभी दर्द में 

कभी मर्ज में

तो कभी फर्ज में

वेदना मिली इस धरती के नरक में

कभी शोर में

कभी भोर में

कभी जोर में

संताप सहे अपनी ओर से

कभी अनजाने में

कभी जान में

तो कभी शान में

कुचले गए है अरमान झूठी पहचान में

कभी प्यार से

कभी मार से

तो कभी दुलार से

छली गयी हूँ मैं स्त्री इस संसार में |

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Hindi Poem  : हिंदी कविता नारी  हृदय 

नारी हृदय प्रभात संग ही बाहर उड़ जाता

जैसे एकाकी “खग” चंचल नभ पर तिर आता

दूर जिंदगी की मीनारों और घाटियों पर

उन प्रतिध्वनियों में है हृदय बुलाता वापस घर

और रात जब नारी हृदय शिथिल हो जाता है

किसी अजनबी पिंजड़े में अपने को पाता है

करता यत्न कि दृग के तारक स्वप्न जाय सब भूल

तन जब पाता क्षत कारा से मानस पाता शूल |

Poems on Nari in hindi
Poems on Nari in hindi

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Hindi Poem ‘Nari Ka Dard’ – हिंदी कविता एक नारी का दर्द

नारी की स्वतंत्रता

मुक्ति नहीं आएगी

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आज या इस वर्ष

कभी नहीं

समझौते और भय के माध्यम से |

मुझे है अधिकार

औरों सा ही

खड़े होने का अपने दोनों पावों पर |

मैं थक गयी सुन सुन,

जैसा है चलने दो |

कल होगा नया दिन |

मुझे चाहिए न मुक्ति मरण – अनंतर |

मैं जी सकती नहीं ऐसे |

मुक्ति है

बीज बली

आरोपित

महती आवश्यकता में |

मेरा भी यहाँ आवास |

ठीक तुम्हारे समान

मुझे भी मुक्ति – अभिलाष |

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