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वायु-मंडल प्रदुषण और ग्लोबल वार्मिंग एक वास्तविक समस्या : Atmosphere pollution Essay in Hindi

वायुमंडल प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग मनुष्य के लिए एक वास्तविक समस्या Atmosphere pollution Essay in Hindi

Atmosphere pollution in hindi
Atmosphere pollution in hindi

वायुमंडल (atmosphere) किसे कहते है ? वायु-मंडल प्रदुषण पर निबंध –

वायु का आवरण जो पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए है, ‘वायुमंडल’ कहा जाता है | पर्यावरण के प्रमुख तत्वों में यह सर्वाधिक गतिशील है, क्योंकि इस में ऋतुओं के अनुसार परिवर्तन होते हैं और छोटी – छोटी अवधि में भी परिवर्तन हो जाता है | वायुमंडल की उत्पत्ति लगभग 1 अरब वर्ष पूर्व सम्भावित है जबकि अपने वर्तमान अवस्था में यह आज से लगभग 58 करोड़ वर्ष पूर्व आया |

वायुमंडल अनेक प्रकार की गैसों का मिश्रण है और जो गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी से बंधा हुआ है | यदि गुरुत्वाकर्षण शक्ति न होती तो इस जीवनदायी वायुमंडल की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी | वर्तमान में तो यह वायुमंडल का एक अभिन्न अंग ही बन गया है | यह पृथ्वी के हजारों मील की उंचाई तक व्याप्त है |

Stralification or Structure of Atmosphere (वायुमंडल परतें) 

वायुमंडल में वायु एवं गैसों की अनेक संकेंद्रित परतें है जो घनत्व, तापमान, एवं स्वभाव की दृष्टि से एक दूसरें से पूर्णत: भिन्न है | सामान्यत: वायुमंडल का नीचे से ऊपर की ओर पांच परतें हैं : ट्राफोस्फियर जो हम पृथ्वी की सतह के निकट रहते हैं, समताप मंडल जो ओजोन परत रखता है, मेसोस्फीयर,  वातावरण के 0.1% के साथ एक ठंडा और निचला घनत्व परत,  ऊष्मवासी,  शीर्ष परत, जहां हवा गर्म है लेकिन बहुत पतली है और एसोस्फीयर इसे वायुमंडल का सीमान्त क्षेत्र कहा जाता है | इस मंडल की हवा अत्यंत विरल होती है और क्रमशः वाह्य अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है |

वायु मंडल के निचले स्तर में भारी गैसे (कार्बन डाई आक्साइड – 20 किमी., ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन – 100 किमी. तथा हाइड्रोज – 125 किमी.) पायी जाती हैं जबकि हीलियम,  निऑन, क्रिप्टान जैसी हल्की और निष्क्रिय गैसें अधिक उंचाई पर पायी जाती है | यद्दपि पृथ्वी के निकट वायुमंडल में वायु का घनत्व सर्वाधिक रहता है किन्तु यह ऊपर की ओर घटता जाता है |

वायुमंडल (Atmosphere) में रासायनिक रूप से सम्मिश्रित गैसों में, शुद्ध और शुष्क वायु में नाइट्रोजन 78 प्रतिशत होती है जबकि ऑक्सीजन 21 % तथा कार्बन डाई आक्साइड 0.03 % और शेष हाइड्रोज, हीलियम, आर्गन, निऑन, क्रिप्टान, जेनान, ओजोन एवं जल वाष्प की अल्प मात्रा 0.97 % उपस्थित रहती है | इतना अवश्य कि धरातल के समीपवर्ती भाग में नाईट्रोजन एवं ऑक्सीजन ही प्रमुखता से मिलती है और सम्पूर्ण वायुमंडलीय आयतन का लगभग 99 % भाग इन्हीं गैसों से निर्मित है |

पृथ्वी के वायुमंडल को वायु प्रदूषण कैसे प्रभावित करता है ?

पृथ्वी पर वायुमंडल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है | इसकी उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी ‘शस्यश्यामलाम, सुजला सुफला’ बनी हुई है | पृथ्वी के चारों ओर अगर इनका आवरण नहीं होता तो चन्द्रमा की तरह इसपर भी वायुमंडल का पूर्णत: अभाव पाया जाता और यह भी एकदम निर्जन होती | वायुमंडल के अभाव में चन्द्रमा पर दिन के समय जहाँ तापमान 100 डिग्री सेंटीग्रेट तक पहुँच जाता है तो रात में यह कम होकर केवल  – 100 डिग्री सेंटीग्रेट पर आ जाता है | इतने अधिक तापान्तर पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है |

वायुमंडल पृथ्वी के सभी प्राणियों के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है | यह सूर्य के तप्त किरणों को छानकर धरती पर आने देता है | यह पृथ्वी पर तापमान के संतुलन और जलवायु के नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है |

पृथ्वी पर विद्यमान मिट्टी, वायु, जीवाणुओं, पौधों और जंतुओं सबकी क्रिया – प्रतिक्रिया से वायुमंडल में तरह – तरह के परिवर्तन होते रहते है, लेकिन अंततः वायुमंडल के सभी तत्वों के बीच एक अनुकूलतम समन्वय बना रहता है | यदि इसमें कोई बड़ा परिवर्तन होता है और इसका संतुलन बिगड़ जाता है तो वह पृथ्वी के समस्त प्राणियों के लिए घातक होता है |

इस तरह जो वायुमंडल पृथ्वी के प्राणियों के लिए जीवनदायिनी है और सूर्य की घातक किरणों से प्राणियों की रक्षा के लिए कवच का काम करता है, उसे मनुष्य स्वयं दूषित करने में लगा हुआ है |

वायु प्रदूषण वायुमंडलीय वायु के प्रदूषण को संदर्भित करता है क्योंकि कुछ पदार्थों और गैसों की उपस्थिति के कारण वायुमंडल में हानिकारक और जहरीले प्रभाव होते हैं जिससे दिन-प्रतिदिन वातावरण की ताजी हवा प्रदूषित हो रही है क्योंकि जिस वायुमंडल में हम रहते और साँस लेते है, उसमे नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और जल वाष्पकणों का मिश्रण है | यह मिश्रण पृथ्वी के सभी प्राणियों के जीवन के अनुकूल है | यह ध्यान देने वाली बात है कि हवा में कुछ गैसों जैसे सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन के आक्साइड, ज्वालामुखी और दलहनों से उत्सर्जन, नमक स्प्रे, पौधों के पराग आदि, प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा इसे हवा में लगातार जोड़ा जा रहा है। इस प्रकार, हवा प्रदूषित हो रही है जिससे इसकी प्राकृतिक संरचना असंतुलित हो रही  है |

औद्द्योग विकास, उर्जा उत्पादन, परिवहन के विस्तार और वनों के विनाश आदि कारकों के चलते पर्यावरण में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढती जा रही है | बढ़ी हुई कार्बन डाई आक्साइड ने ग्रीन हाउस प्रभाव को जन्म दिया है | वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की एक चादर सी बनी है जिसकी वजह से सूर्य के प्रकाश के साथ पृथ्वी पर आई इन्फ्रारेड – एक्टिव किरणें पूर्णतया वापस नहीं हो पाती और कार्बन डाई आक्साइड में जब्त हो जाती हैं | इस तापीय उर्जा के वायुमंडल में कैद हो जाने से धरती के औसत तापमान में वृद्धि होती है, जिसे वैश्विक तापमान कहते है | वर्तमान में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न भूमंडलीय उष्मीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) एक सार्वभौमिक समस्या है | इस समय विश्व का कोई भी देश इससे अछूता नहीं है | ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है |

शिकागों विश्वविद्यालय के पर्यावरणीय वैज्ञानिक डॉ. वी. रामनाथन के अनुसार “पृथ्वी का औसत तापमान, जो ग्रीन हाउस गैसों के कारण लगभग 11.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ चूका है और अब वायुमंडल में प्रदुषणकारी गैसें नही छोडा जाये, तो भी वर्ष 2030 तक 1980 की अपेक्षा पृथ्वी का तापमान 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जायेगा | इस तापमान वृद्दि के परिणाम भयानक होंगे |”

भूमंडलीय उष्मीकरण के अतिरिक्त प्रदुषण, उद्योगों में काम आने वाली गैसों का अंधाधुंध प्रयोग वायु को तेजी से प्रदूषित कर रहा है | इन गैसों से वायुमंडल के ‘हाइड्रॉक्सिल’ नामक परिशोधक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है अर्थात वायुमंडल की परिशोधन क्षमता घट जाती है | जीवमात्र के स्वस्थ जीवन के लिए वायुमंडलीय परिशोधन नितांत आवश्यक है |

पृथ्वी पर जीवधारियों की रक्षा व्यवस्था में ओजोन पर्त का सबसे अधिक महत्त्व है | ओजोन ऑक्सीजन के वर्ग की एक गैस है किन्तु यह जहरीली होती है | हमारी पृथ्वी के वायुमंडल में समुन्द्र के जल स्तर से 20 किलोमीटर ऊंचाई से 50 किलोमीटर ऊंचाई तक लगभग 30 किलोमीटर की मोटी पर्त ओजोन गैस की पर्त है | यह गैस सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों के विकिरण से स्वत: बनती रहती है | अत: यह पृथ्वी का स्थायी कवच है | इस स्थायी कवच को मनुष्य विभिन्न प्रकार के आणविक परीक्षणों, वायुशीतलीकरणों आदि के माध्यम से क्षतिग्रस्त कर रहा है |

ओजोन पर्त हमारे साँस लेने वाले वायुमंडल से ऊपर है | यह जीवनरक्षक है क्योकि यह सूर्य की पैराबैंगनी किरणों को छानकर पृथ्वी पर आने देती है | यदि सूर्य की पैराबैंगनी किरणें सीधे पृथ्वी पर आए तो उनसे मनुष्य को त्वचा कैंसर तथा आँखों की अनेक बीमारियाँ हो सकती है | अत: ओजोन पर्त मनुष्य को सूर्य की पैराबैंगनी किरणों के विकिरण से बचाने अर्थात मनुष्य को कैंसर जैसी घातक रोग से बचाने का काम करती है |

कुछ समय पहले वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि दक्षिणी धुव्र पर ओजोन गैस की पर्त कट रही है और उसमें छेद बन गया है | अमेरिका के अन्तरिक्ष संगठन ने एक टोही विमान दक्षिणी धुव्र के उच्च वायुमंडल की ओर भेजा | इस उड़ान से पता लगा कि ओजोन पर्त उतना बड़ा छेद हो गया है जितना अमेरिका देश का आकार है | पर्त में कुछ स्थानों और ऊंचाइयों पर 97% तक ओजोन गैस गायब है | यह भी पता चला है कि वहां क्लोरिन मोनोऑक्साइड गैस घनी मात्रा में पहुँच गयी है |

क्लोरिन मोनोऑक्साइड गैस का मिलना यह सिद्ध करता है कि ओजोन पर्त में छेद के लिए मनुष्य की गतिविधियाँ जिम्मेदार है | क्लोरिन मोनोऑक्साइड औद्योगिक रसायन क्लोरोफ्लोरो कार्बन से उत्पन्न होती है | क्लोरोफ्लोरो कार्बन एक गैस है जो उद्योगों में बहुत इस्तेमाल होती है | इसकी एक विशेष बात यह है कि यह बहुत टिकाऊ होती है और इसके नष्ट होने में सैकड़ो साल लग जाते है |

वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बताया गया है कि ओजोन पर्त में 1% की कमी हो जाए तो एक ही साल में संसार में 70,000 व्यक्ति त्वचा के कैंसर के शिकार हो जाएंगे | यदि पृथ्वी पर पैराबैंगनी किरणों का विकिरण बढ़ जाएगा तो मनुष्यों में रोगों और संक्रमण से लड़ने की शक्ति कम हो जाएगी और वह अधिकाधिक रोगों का शिकार बन जाएगा | इस विकिरण से जेनेटिक विकृतियाँ भी उत्पन्न हो सकती है और भावी पीढ़ियां भी उनसे बच नहीं पाएंगी | पालतू और जंगली पशुओं को भी त्वचा व आँख की बीमारियाँ हो सकती है | समुंद्री जीव जंतु भी नष्ट हो सकते है |

इस प्रकार समुंद्री और स्थलीय जीव संतुलन नष्ट हो सकता है जो मानव के लिए अत्यधिक विनाशकारी होगा | पृथ्वी पर अधिक विकिरण आने से पृथ्वी पर तापमान भी बढ़ सकता है और पृथ्वी के औसत तापमान में 2 – 3 डिग्री का मामूली परिवर्तन होने से विशाल जलप्लावन हो सकता है और मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तन हो सकते है | यही नहीं भूतल पर ऐसे रोग भी विकसित हो सकते है जिनका इलाज करना आसानी से संभव नहीं है |

अत: ओजोन पर्त से कटाव अथवा छेद का नतीजा मनुष्य के लिए विनाशकारी है | लेकिन इस अवस्था के लिए मनुष्य स्वयं उतरदायी है | उसकी गतिविधियों से वायुमंडल का संतुलन बिगड़ रहा है | वायुमंडल का संतुलन बिगड़ने से पृथ्वी पर जीवन दूभर हो सकता है | यदि मनुष्य अब भी नहीं चेतता तो वह स्वयं विनाश को आमंत्रण दे रहा है |

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3 thoughts on “वायु-मंडल प्रदुषण और ग्लोबल वार्मिंग एक वास्तविक समस्या : Atmosphere pollution Essay in Hindi”

  1. इस समय हमारे वातावरण मे कार्बन डाई आक्साइड ,नाइट्रोजन आक्साइड, कलोरोफ्लोरो कार्बन ,मेथेन की मात्रा कितना है । क्योकि ये गैस ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण है।

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