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होली पर निबंध – Holi Essay in Hindi – KhayalRakhe.com

हिन्दू पर्व होली के महत्व पर विस्तृत निबंध – Essay on Holi in Hindi Language

Holi Essay in Hindi
Holi Essay in Hindi

Holi Essay in Hindi होली पर निबंध – भारत के सांस्कृतिक और पारम्परिक उत्सवों में होली पर्व का प्रमुख स्थान है। होली रंगो का त्योहार है । इसे फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि के दिन भारतवर्ष के समस्त अंचलों में समान रूप से मनाया जाता है। शीत ऋतु के अन्त में और बसंत ऋतु के आरंभ में यह उत्सव अपना विशेष आकर्षण रखता है। बसंत ऋतु में जब यह उत्सव मनाया जाता है, प्रकृति की शोभा अनुपम होती है। वास्तव में यह भारतीयता का शीर्षस्थ पर्व है ।

हर्षोल्लास का चरमोत्कर्ष इस पर्व की सबसे खास विशेषता होती है। इस दिन सभी बड़े और खासतौर पर युवा अपने खुशबूदार गुलालों को एक – दूसरे के माथे पर लगाते है, रंग डालते है और सारे गिले शिकवें भुलाकर आपस में एक-दूसरें के गले मिलते हैं।

इसमें हर व्यक्ति विभिन्न तरीकों से अपने अंदर के उल्लास को उजागर करने के लिए बहुत उत्साहित रहता है। कई जगहों पर ढ़ोलक और हारमोनियम की धुन पर सांस्कृतिक गान और नृत्य करते हैं, जिससे होली का माहौल मंगलोत्सव में बदल जाता है। तभी तो बरसाने की ‘लठमार होली’ आज भी पुरे विश्व में प्रसिद्द है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में देश – विदेश से लोग बरसाना आते हैं। वही राजस्थान में होली के अवसर पर अभिनय की परम्परा है। इसमें किसी नुक्कड़ नाटक की शैली में मंच सज्जा के साथ कलाकार आते है और अपने पारंपरिक हुनर का नृत्य और अभिनय से परिपूर्ण प्रदर्शन करते है। मध्यप्रदेश में होली की ‘भगौरिया’ कहते हैं। यह पर्व भील जाति के युवकों के लिए अपनी जीवन-संगिनी चुनने का त्यौहार है ।

होली मनाने के मूल में अनेक कारण माना जाता है। पर होली वास्तव में ऋतु और मौसम सम्बन्धी उत्सव या पर्व है। पतझड़ के बाद जब वसंत नए विकास, आनन्द और उन्माद का संदेश लेकर आता है तो चारों ओर का प्राकृतिक वातावरण नये – नये रंग – बिरंगे फूलों और उनकी महक से रंग जाता है जिसे देख सबका मन मस्ती में झूम उठता है। यह मस्ती ही होली के रूप में अनेक प्रकार के रंग – गुलाल से एक दूसरे को रंग डालने, एक दूसरे के गले मिलने, खाने – खिलाने के रूप में प्रगट हुआ करती है। मुख्यत: इसी कारण होली को ऋतु और मौसम का त्यौहार माना जाता है।

होली को फसल का त्यौहार भी स्वीकार जाता है। इस मौसम के आते – आते खेतों में एक ओर जहाँ सरसों पीली पड़कर फूल – महक उठती है, वहां चने की फसल भी प्राय: पककर तैयार हो जाती है। लोग पके हुए पर हरे चने की बालियों सहित पौधे उखाड़कर उन्हें आग में भुनते है। ये पके चने की बालियाँ ‘होलां’ या ‘होरां’ कही जाती है |.इस प्रकार चने की फसल पककर तैयार हो जाने, उसपर रंग – बिरंगा बासंती मौसम होने पर झूमते गाते लोग रंग – गुलाल उड़ाकर होली का त्यौहार मनाते है। यह स्पष्ट है होली वास्तव मे ऋतु और फसल का त्यौहार है।

इस होली त्यौहार के साथ एक धार्मिक कहानी भी जुडी है। इस पौराणिक कहानी के अनुसार हिरण्यकश्यपु नामक एक राजा था। उसका राज्य मुलतान (जो अब पाकिस्तान में है) तथा आसपास के इलाके पर था। उसके बेटे का नाम था प्रह्लाद, कि जो अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध राम – नाम की भजन – भक्ति किया करता था। पिता के चाहने और अनेक कष्ट देने पर भी प्रह्लाद ने जब राम – नाम का भजन नहीं छोड़ा, तो हिरण्यकश्यपु ने उसे जलाकर मार डालने का निश्चय किया।

इस काम के लिए उसने आग से न जलने का वरदान  – प्राप्त अपनी होलिका नामक बहन को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए। उस (होलिका) ने ऐसा ही किया। पर भगवान की लीला, होलिका स्वयं जलकर राख हो गयी, जबकि प्रहलाद हँसता – खेलता बच गया।

कहा जाता है कि तभी से लोग आसुरी शक्ति पर देवी – शक्ति की विजय की याद में यह त्योहार रंग – गुलाल खेलकर मनाते आ रहे है। आज भी धार्मिक प्रवृत्तियों वाले लोग एक दिन पहले गली – मुहल्लों में सामूहिक स्तर पर होलिका दहन करते है, अगले रोज रंग – गुलाल खेलते, खाते – पीते और गले मिलकर आनंद प्रगट करते है। इससे उनकी धार्मिक और ऋतु – फसल सम्बन्धी सभी प्रकार की धारणाएं पूर्ण हो जाती है।

दोस्तों होली मनाने का कारण जो भी हो, इतना स्पष्ट है कि होली आनंद मंगल का त्यौहार है पर आज के परिपेक्ष्य में होली का रंग बदरंग हो चूका है। इसके पीछे अंतर्निहित मर्म समाप्त हो चूका हैं। कुछ दुष्प्रवृत्तियों वाले लोगों के कारण, कुछ जीवन – व्यवहार और दृष्टीकोण बदल जाने के कारण अनेकविध अभावों और मंहगाई के कारण होली का रंग – रूप फीका पड़ता जा रहा है।  

लड़कियों को रंग भरे गुब्बारे मारकर छेड़छाड़ और शरारतें की जाती है। रंगों के नाम पर कीचड़ तथा विषैले तत्त्वों का प्रयोग भी किया जाता है। परिणामस्वरुप कई बार लोगों का अंग – भंग तक हो जाता है। इस प्रकार की बीमारियों का रोकथाम करके ही होली को पवित्र और वास्तविक बनाये रखा जा सकता है।

गंभीरता से विचार करके कहा जा सकता है कि होली वास्तव में मानव – मन की विविध और पवित्र, रंग – विरंगी उमंगों का परिचय देने वाला त्यौहार है। यह दिन सभी प्रकार के वैर – विरोध भुलाकर एक ही रंग में रंग जाने का संदेश देता है। अत: इसी रूप में इसे मनाकर ही हम इसके वास्तविक महत्व और स्वरुप को बनाये रख सकते है। इसके लिए हमें होली को ऐसे रंगों से खेलना चाहिए, उन तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए जिसमें सम्मिलित होने के लिए सब आतुर हों।

होली के दिन किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं, बल्कि आत्मीयता का प्रयास होना चाहिए। होली के दिन ऐसा उल्लास हर दिल में जगना चाहिए कि नीरस दिलों में भी उल्लास के वातावरण का सृजन हो सके और उसे इतना ख़ुशी से भर सके कि फिर आने वाली होली तक यह होली स्मरणीय रहे, उत्साह व उल्लास जगाती रहे।

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