Mehnat Ka Fhal
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परिश्रम : मेहनत का फल Parishram ka Phal kahani in hindi

परिश्रम/मेहनत का फल (Mehnat/Parishram Ka Phal Kahani In Hindi)

Parishram ka Fal Hindi Story : शिवपुर गांव में सूर्यभान नाम का गरीब श्रमिक रहता था | वह मजदूरी करके अति कठिनाई से अपना और अपनी पत्नी का भरण-पोषण कर पाता था |एक दिन वह प्रभात के पश्चात् मजदूरी की खोज में अपने घर से बाहर निकला | जब वह गाँव से बाहर चौपाल के निकट पहुंचा, तो उसने देखा कि चौपाल में गाँव के सभी लोग एकत्र हैं और गाँव का मुखिया क्रम-क्रम से एक – एक आदमी को अपने पास बुलाकर उससे कुछ कह रहा है | यह सब देख सूर्यभान ने सोचा अवश्य कोई न कोई बड़ी बात है | उसके मन में जानने की तीब्र उत्कंठा उत्पन्न हो उठी | वह भी चौपाल में जाकर एक ओर खड़ा हो गया और मुखिया की बातों को ध्यान से सुनने लगा |

हिंदी कहानी परिश्रम का फल Parishram Ka Phal
हिंदी कहानी : परिश्रम का फल

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मुखिया चौपाल में उपस्थित सभी व्यक्तियों को जब एक-एक करके बुला चुका तो उसकी दृष्टि एक कोने में खड़े सूर्यभान पर पड़ी | उसने सूर्यभान को भी पास बुलाया और कहाँ, “सूर्यभान, कल हमारे ग्राम में भगवान बुद्ध के शिष्य महाश्रमण कश्यप अपने एक हजार शिष्यों के साथ पधार रहें  हैं | गांव का प्रत्येक मनुष्य उनके भोजन का प्रबंध कर रहा है | हर कोई पांच या दस भिक्षुओं को अपने घर पर खिलायेगा | बताओं, तुम कितने भिक्षुओं को खिलाओगे ?”

सूर्यभान ने विनम्र निवेदन के साथ कहा, “मुखियाजी, आप तो जानते हैं, मैं कितना गरीब हूं | मेरे पास खेत – खलिहान कुछ भी तो नहीं है | किसी तरह मजदूरी करके मुश्किल से दो प्राणियों के लिए रोटी जुटा पाता हूं फिर  मैं किसी भिक्षु को कैसे खाना खिला सकता हूं ?”

मुखियाजी बोले पड़े, “देखों सूर्यभान, तुम बड़े स्वार्थी हो | जो मनुष्य केवल अपने ही पेट की चिंता में लगा रहता है और दान-पुण्य नहीं करता, उसका यही हाल होता है |”

मुखिया जी की बातें सुनकर सूर्यभान के मन में उत्साह उत्पन्न हो उठा | उसने कहा, “अच्छी बात है मुखियाजी, मेरा भी नाम लिख लीजिए | मैं भी एक भिक्षु को भोजन कराऊंगा |”

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सूर्यभान मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ | उसने सोचा, आज तक तो मैं केवल अपना ही पेट भरता रहा लेकिन कल एक बौद्ध भिक्षु के पेट को भरने का अवसर मिला है | इससे बढ़कर अच्छी बात और क्या हो सकती है ?

आपार खुशी के कारण सूर्यभान मजदूरी को भूल गया | वह तुरन्त पत्नी को बताने के लिए घर की ओर दौड़ पड़ा | जब उसने घर पहुंचकर अपनी पत्नी को बताया, तो उसकी पत्नी भी अत्यधिक प्रसन्न हुई | उसने कहा, आप ने यह काम तो बड़ा अच्छा किया | अभी तक हम लोग अपना ही पेट भरते रहे है लेकिन कल बौद्ध भिक्षु की सेवा का सुअवसर प्राप्त होगा | ऐसा अवसर बड़े भाग्य से मिलता है |”

सूर्यभान बोला, “हां सचमुच ऐसा अवसर भाग्य से ही मिलता है अच्छा तुम सबसे पहले घर की सफाई आदि समाप्त कर लों  | मैं मजदूरी के लिए जा रहा हूं | भगवान ने चाहा तो परिश्रम का फल अवश्य मिलेगा और हम बौद्ध भिक्षु की अच्छी सेवा कर सकेंगे |”

सूर्यभान मजदूरी के लिए घर से निकल पड़ा | वह धीरे – धीरे आगे बढ़ रहा था और मन ही मन सोच रहा था, यदि मैं गरीब न होता, तो मैं भी पांच- दस भिक्षुओं की सेवा करता | ईश्वर ने एक भिक्षु की सेवा का अवसर प्रदान किया है | यदि कही मेहनत का फल अच्छा मिल जाता तो बौद्ध भिक्षु की अच्छी सेवा करके मन की श्रद्धा पूरी कर लेता | और तभी सहसा किसी का स्वर सूर्यभान के कानों में गूंज उठा – “सूर्यभान, अरे ओ सूर्यभान !!”

वह स्वर गांव के साहूकार का था | सूर्यभान ने उसकी ओर देखकर, उसे झुकर नमस्कार किया | साहूकार सूर्यभान के नमस्कार का उत्तर देते हुए बोला, “सूर्यभान, कल मेरे घर पर सौ भिक्षुओं का भोजन पकना है, पर सूखी लकड़ियाँ नहीं है | जंगल से लकड़ियाँ मंगाने में बहुत वक्त लग जाएगा | सामने पेड़ों की सूखी और मोटी – मोटी डालें गिरी पड़ी हैं क्या तुम इन्हें जलाने योग्य बना दोगे | मैं तुम्हें इस कार्य के लिए अच्छी मजदूरी दूंगा पर ध्यान रहे मजदूरी तभी मिलेगी जब तुम सारी लकड़ियाँ काट दोगे |”

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सूर्यभान ने लकड़ियों की ओर देखा | वे इतनी अधिक थीं कि पूरे दिन काम करने पर भी एक आदमी उन्हें नहीं काट सकता था, पर सूर्यभान को दूसरे दिन बौद्ध भिक्षु की अच्छी सेवा करनी थी | इसलिए उसने सोचा, ‘मैं कड़ी मेहनत करूंगा इससे मुझें अच्छी मजदूरी अवश्य मिल जाएगी |’ और वह लकडियां काटने में परिश्रम के साथ जुट गया |

वह पूरे दिन कुल्हाड़ा चलाता रहा | सूर्य डूब गया, संध्या हो आई, पर फिर भी सूर्यभान का कुल्हाड़ा लगातार चलता रहा और जिसकी वजह से उसके अंग-अंग पीड़ा से टूट रहे थे | वह पसीने में डूबा हुआ था | फिर भी उसका कुल्हाड़ा चलता जा रहा था, चलता जा रहा था | अचानक उसके कानों में साहूकार के शब्द गूंज उठे – ‘पर ध्यान रहे, मजदूरी तभी मिलेगी, जब पूरी लकडियां कट जायेंगी |’

सूर्यभान अब सभी लकड़ियों को काट करके ही दम लेना चाहता था | साहूकार दूर खड़ा होकर उसके परिश्रम को देख रहा था और मन ही मन सोच रहा था, न जाने किस आशा में इतना परिश्रम कर रहा है और अपने रक्त को पानी बना रहा है |

आखिर, एक घंटा रात बीतते – बीतते सारी लकड़ियां कट गईं | साहूकार बोला, “मैं तुम्हारे परिश्रम से मुग्ध हूं | आज मैं तुम्हें इतनी मजदूरी दूंगा कि तुम्हें दो-तीन दिनों तक काम करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी |”

साहूकार ने भीतर से एक बड़े टोकरे में चावल और सब्जियां मंगा कर सूर्यभान को देते हुए कहा, “ले जाओ | दो-तीन दिनों तक आराम से बैठकर खाओ |”

सूर्यभान चावल और सब्जियों की ओर देखता हुआ बोला, “यह तो बहुत ही अधिक है, साहूकार जी !”

साहूकार ने उत्तर दिया, “तुमने जितना और जिस तरह परिश्रम किया है, उसे देखते हुए यह कुछ नहीं है |” सूर्यभान चावल और सब्जियों का टोकरा लेकर अपने घर पहुंचा | वह अपनी पत्नी को टोकरा सौपते हुए बोला, “भगवान ने प्रार्थना सुन ली | उन्होंने मेरे परिश्रम का फल दिया है | पर मेहनत से मेरे अंग –अंग टूट रहे हैं | मैं अब चारपाई पर पड़ना चाहता हूं |” वह कुछ खा – पीकर चारपाई पर लेट गया | पति और पत्नी दोनों के मन में सेवा की प्रसन्नता का सागर उमड़ रहा रहा था | प्रसन्नता के कारण उन्हें रात – भर नींद भी नहीं आई |

सवेरा होते ही पति और पत्नी दोनों उठ पड़े | सूर्यभान ने अपनी पत्नी से कहा, “नहा – धोकर भोजन बनाने में लग जाओ | आज इतना अच्छा भोजन बनाना कि बौद्ध भिक्षु खायें, तो तृप्त हो जाएं |”

पत्नी बोली, “अच्छा भोजन बनाने से अच्छा नहीं बनता | भोजन तो अच्छा बनता ही मन की श्रद्धा से | मन में जितनी ही अधिक श्रद्धा और जितनी ही अधिक पवित्रता होती है, भोजन उतना ही अधिक अच्छा तैयार होता है | तुम चिन्ता मत करो | मैं बड़े प्रेम और चाव से भोजन तैयार करूंगी |”

अभी वे बातें ही कर रहे थे कि एक तेज मुख-मण्डल वाला ब्राह्मण उनके सामने आकर खड़ा हो गया और बोला “मैं एक ब्राह्मण हूँ और पाक विधा में निपुण हूँ | मैंने सुना है आज आपके घर एक बौद्ध भिक्षु का भोजन है | कृपा करके आप भोजन बनाने का कार्य मुझे सौंप दीजिए |”

सूर्यभान बोला “ मैं तो एक गरीब आदमी हूँ | मैं तुम्हे मजदूरी नहीं दे पाऊंगा |”

ब्राह्मण बोला “ मैं तुमसे मजदूरी नहीं लूँगा | बस मुझे भोजन बनाने दीजिए |”

ब्राह्मण अपनी बात समाप्त करते हुए रसोईघर में चला गया और भोजन बनाने के कार्य में जुट गया | उसके प्रेम और श्रद्धा को देखकर सूर्यभान भी मौन हो गया |

जब भोजन तैयार हो गया तो सूर्यभान मुखिया के पास गया और किसी बौद्ध भिक्षु को उसके घर भेजने का निवेदन करने लगा |

मुखिया बोला “तुमने आने में देर कर दी | जिस भिक्षु को जहां भोजन करने जाना था, वह वहां चला गया | अब तो एक भी भिक्षु नहीं बचा है, जिसे तुम्हारे घर भेज सकू | मुझे दुःख है, मैं कुछ नहीं कर सकता |”

सूर्यभान दुखी मन से घर की ओर लौट पड़ा कि तभी उसने देखा कि एक जगह बौद्ध भिक्षु लोगो को उपदेश दे रहे थे | सूर्यभान ने उनके पास जाकर उनके चरण स्पर्श किये और कहा “भगवन एक बौद्ध भिक्षु को भोजन कराने के लिए मैंने कड़ी से कड़ी मेहनत की और बड़े प्रेम और श्रद्धा से भोजन तैयार करवाया लेकिन अब जब भोजन तैयार हो गया है तो कोई बौद्ध भिक्षु नहीं मिल रहा है, समझ में नहीं आ रहा है कि अब मैं क्या करूँ ? ”

हिंदी कहानी परिश्रम का फल Parishram Ka Phal
Parishram Ka Phal

भिक्षु बोले “ बस इसी बात से तुम इतने दुखी हो | चलो मैं तुम्हारे घर भोजन करने के लिए चल रहा हूँ |”

वृद्ध भिक्षु अपने कथन को समाप्त करते हुए आसन से उठ पड़े | सूर्यभान का ह्रदय हर्ष से भर गया | वह आंखो से आनन्द के आंसू टपकाता हुआ बोला, “ भगवन, आपने मुझ पर कृपा करके मुझे दुःख के महासमुद्र में डूबने से बचा लिया |”

सूर्यभान वृद्ध भिक्षु को साथ लेकर, अपने घर की ओर चल पड़ा | श्रोता विस्मित हो उठे, परस्पर विस्मय भरे स्वर में कहने लगे, “यह क्या है ? कश्यप एक गरीब के घर भोजन करने जा रहे हैं | ऐसे गरीब के घर जो गांव का एक मामूली श्रमिक है |”

सचमुच वे वृद्ध भिक्षु कश्यप थे, जो भगवान् बुद्ध के समान ही आदरणीय थे, जनता उनकी पूजा करती थी |

थोड़ी ही देर में यह बात पूरे गांव में बिजली की तरह फैल गई, कश्यप भगवान् श्रमिक के यहां भोजन करने गए हैं |

गांव में स्त्री-पुरुष सूर्यभान के घर की ओर दौड़ पड़े | वहां जाकर सबने देखा – कश्यप के सामने साधारण भोजन रखा हुआ है और वे उसे बड़े प्रेम से खा रहे हैं |

गांव के लोगों ने कश्यप भगवान् से प्रश्न किया, “भगवन् आप गांव के बड़े – बड़े धनपतियों के घरों के भोजन को छोड़कर एक श्रमिक के घर रुखा – सूखा भोजन क्यों कर रहे हैं ?”

कश्यप ने उत्तर दिया, “जो भोजन परिश्रम और ईमानदारी से प्राप्त किया जाता है, उस भोजन से ज्ञान तो बढ़ता ही है, आयु भी बढ़ती है | सूर्यभान का यह भोजन स्वर्ग के भोजन से भी उत्तम और आनन्दमय है | इसने अपने भोजन की सामग्री कड़े परिश्रम से प्राप्त की है | मैं ही नहीं, इसके भोजन को तो स्वर्ग के देवता भी बड़े प्रेम से ग्रहण कर सकते हैं |”

कश्यप ने अपना कथन समाप्त किया ही था कि एक अधिक विस्मयकारिणी घटना घटी | हुआ ये कि जिस ब्राह्मण ने भोजन तैयार किया था, वह अभी तक चुपचाप खड़ा था | जैसे ही कश्यप ऋषि का कथन समाप्त हुआ वह उड़कर आकाश की ओर जाने लगा | वहां एकत्र सभी स्त्री – पुरुष चकित दृष्टि से उसकी ओर देखने लगे |

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ब्राह्मण ने ऊपर जाकर, एकत्र स्त्री – पुरुषों को सम्बोधित करते हुए कहा, “सूर्यभान की मेहनत, उसकी श्रद्धा पर भगवान बुद्ध प्रसन्न हो उठे हैं | मैं देवराज इंद्र हूं | भगवान बुद्ध की इच्छा से मैंने सूर्यभान के घर रसोइये का काम किया |”

ब्राह्मण रूपी देवराज इन्द्र ने सूर्यभान को सम्बोधित करते हुए कहा, “सूर्यभान, भगवान बुद्ध की तुम पर कृपा हुई हैं | तुम अब कभी गरीब नहीं रहोगे |”

आश्चर्य, महान आश्चर्य ! देवराज इन्द्र के कथन समाप्त होते ही आकाश से रत्नों, जवाहरातों और मणियों की वृष्टि होने लगी | थोड़ी ही देर में इतने रत्नों की वृष्टि हुई कि उसका घर भर गया | गांव वाले भी सूर्यभान को देखकर यह समझ गए थे कि जीवन में परिश्रम का महत्व क्या है |

Moral of Hindi Story on Mehnat Ka Fhal

परिश्रम से कोई भी व्यक्ति अपना भाग्य बदल सकता है | भगवत गीता में भी श्री कृष्ण ने कहा है की यदि आप धर्म करोगे तो आपको ईश्वर से मांगना ही पड़ेगा लेकिन यदि आप कर्म करोगे तो ईश्वर को आपको देना ही पड़ेगा | जो मनुष्य कर्म को पूजा मानकर श्रद्धा के साथ करता है उसको उसकी मेहनत का फल जरुर प्राप्त होता है | इसलिए मनुष्य को अपने मेहनत पर विश्वास करना चाहिए और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारना चाहिए क्योंकि परिश्रम का फल जरुर मिलता है |

We are thankful to Upma ji for sending such useful story on Mehnat Ka Fhal.  Upma ji is a software engineer and currently working in TCS Lucknow office.

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Babita Singh
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