वट सावित्री व्रत
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वट सावित्री व्रत की पूजा विधि, कथा व महत्व

Vat Savitri Vrat Vidhi In Hindi : भारतीय संस्कृति में ज्येष्ठ माह की अमावस्या को सुहागिन महिलाओं द्वारा वट सावित्री व्रत किया जाता है | इस दिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु की कमाना से वट वृक्ष की पूजा करती है, उपवास रखती है और सावित्री – सत्यवान की कथा सुनती है |

इस व्रत को रखकर सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण बचाए थे, इसी कारण से इसका नाम वट सावित्री व्रत पड़ा |

Vat Savitri Vrat Vidhi, Katha Aur Mahatv In Hindi

वट सावित्री व्रत की पूजा

वट सावित्री व्रत को सौभाग्य, दीर्घायु और आरोग्य प्रदान करने वाला व्रत माना जाता है | हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि जो भी स्त्री वट सावित्री व्रत को रखती है उसका वैवाहिक जीवन सुखमय होता है और पति को दीर्घायु मिलती है | इस व्रत की मान्यता करवा चौथ व्रत के सामान ही है | आज मैं आप को वट सावित्री व्रत के दिन वट वृक्ष की पूजा कैसे करें, कथा कब सुनें और इस व्रत के महत्व के बारें में जानकारी दूंगी |

2017 में वट सावित्री व्रत कब है ?( 2017 Me Vat Savitri Vrat Kab Hai ?)

2017 में वट सावित्री व्रत 25 मई को है |

वट सावित्री व्रत की पूजा कैसे करें ?(Vat Savitri Vrat Vidhi)

  • वट सावित्री व्रत के दिन प्रात:काल पूरे घर की सफाई करें |
  • सूर्योदय स्नान के बाद सम्पूर्ण घर को गंगाजल से पवित्र करें |
  • एक बांस की टोकरी में वट सावित्री व्रत की पूजा की सामग्री (सत्यवान – सावित्री की मूर्ति, बॉस का पंखा, लाल धागा, धूप, मिट्टी का दीपक, घी, फूल, फल, चना, रोली, कपडा, सिंदूर, जल से भरा हुआ पात्र) को व्यवस्थित कर लें |
  • वट वृक्ष के आस – पास भी सफाई कर लें | अब वट सावित्री व्रत की पूजा आरम्भ करें |
  • सर्वप्रथम पूजा स्थान पर सावित्री और सत्यवान की मूर्ति स्थापित करें | अब धूप, रोली, सिंदूर व दीप जलाकर पूजा करें |
  • लाल रंग का कपडा सावित्री और सत्यवान को अर्पित करें और फूल समर्पित करें |
  • बांस के पंखे से सावित्री और सत्यवान को हवा करें | पंखा करने के बाद वट वृक्ष के तने पर कच्चा धागा लपेटते हुए 5, 11, 21, 51 या 108 बार परिक्रमा करें |
  • परिक्रमा करेने के पश्चात वट सावित्री व्रत की कथा सुने |
  • वट सावित्री व्रत में दान बांस की टोकरी में वस्त्र, फल, मिठाई आदि रखकर करें |

वट सावित्री व्रत कथा (Vat Savitri Vrat Katha)

भद्र देश के राजा अश्वपति की कोई सन्तान नहीं थी | इसको लेकर राजा और रानी बहुत चिंतित रहते थे | उन्होंने पुत्र प्राप्ति की कामना के लिए सावित्री का जप किया | उनके जप से सावित्री ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और वर मांगने के लिए कहा | राजा ने उनसे पुत्र की याचना की |

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सावित्री ने कहा, “राजन ! तुम्हारे भाग्य में पुत्र तो नहीं, पर एक पुत्री की प्राप्ति होगी और उसका नाम तुम मेरे नाम पर रखना |”

नौ महीने बाद रानी के गर्भ से एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया और वरदान के अनुसार ही राजा – रानी ने अपनी पुत्री का नाम सावित्री रखा |

धीरे – धीरे समय बीतता गया और वह समय भी आ गया जब राजकुमारी सावित्री विवाह के योग्य हो गई | राजा ने राजकुमारी को अपना वर खोजने का आदेश दिया | सावित्री ने वर के रूप में सत्यवान को चुना | सत्यवान धुत्मसेन के इकलौते पुत्र थे | राजा धुत्मसेन का राज्य रुक्मी ने छीन लिया था | और वे अंधे होकर वन में कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे थे |

नारद जी को जब यह बात पता चली कि सावित्री ने सत्यवान को वर के रूप में चुना है तो नारद जी ने महाराज से कहा, महाराज ! “सावित्री ने अपने लिए योग्यतम वर को चुना है | वासत्व में सत्यवान बड़ा ही धर्मात्मा, गुणवान एवं रूपवान है | वह सभी शास्त्रों का ज्ञाता है | किन्तु खेद है कि वह अल्पायु है और इस वर्ष के समाप्त होते ही उसका जीवन समाप्त हो जायेगा |”

राजा को सत्यवान की अल्पायु के बारें में ज्ञात होते ही उन्होंने सावित्री से कहा ! “पुत्री ! कोई दूसरा वर ढूढ लो | सत्यवान अल्पायु है, अत: अल्पायु युवक से विवाह करना उचित नहीं है |” तब सावित्री ने अपने पिता से कहा, “ मैंने जिसका एक बार वरण कर लिया है उसका त्याग मैं कदापि नहीं कर सकती पिताजी |”

राजा ने पुत्री की बात मानकर सावित्री और सत्यवान का विवाह कर दिया और विवाह के बाद सत्यवान की दीर्घायु के लिए सभी लोग मंगल कामना करने लगे |

धीरे – धीरे समय बीतता गया और वह समय भी अति निकट आ गया, जिस दिन सत्यवान का देहावसान होने वाला था | सावित्री अपने पति की प्राण रक्षा हेतु तीन दिन पहले से ही व्रत और उपवास रखने लगी और तीसरे दिन उसने पितृदेवों का पूजन किया |

नित्य की भांति उस दिन भी सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने के लिए निकल पड़े | सावित्री ने भी अपने सास – ससुर के पैर छूकर आज्ञा लिया और सत्यवान के साथ जंगल की ओर चल पड़ी |

वट सावित्री व्रत का महत्त्व

जंगल पहुंचकर जैसे ही सत्यवान ने लकड़िया काटनी शुरू की उनके सर में दर्द उत्पन्न होने लगा | अत: वह पेड़ से उतर आये और सावित्री की जांघ पर सर रखकर सो गए | कुछ देर उपरांत सावित्री ने देखा कि यमराज उसके समकक्ष खड़े है |

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यमराज सावित्री से विधि का विधान बताकर सत्यवान की आत्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए | सावित्री भी उनके पीछे – पीछे चलने लगी | काफी दूर निकल जाने पर यमराज ने सावित्री से कहा, “ मनुष्य जहाँ तक मनुष्य का साथ दे सकता है, वहां तक तुमने सत्यवान का साथ दिया | अब तो तुम्हें लौट जाना चाहिए |” तब सावित्री ने यमराज से कहा, “जहाँ तक मेरे पति की आत्मा जाएगी वहां तक मैं भी जाउंगी | ऐसा करने से दुनिया की कोई शक्ति मुझें नहीं रोक सकती है |”

यमराज ने सावित्री को समझाते हुए कहा, “बेटी मैं तेरी बातों से अत्यन्त प्रसन्न हूँ | अत: तुम सत्यवान के जीवन के अलावा कोई भी वस्तु मुझसें मांग लो |”

सावित्री ने विचार किया और यमराज से कहा, “ महाराज ! मेरे ससुर की दोनों आँखे खराब है, अत: आप कृपा करें कि उनके दोनों नेत्र पूर्वावस्था में चले आवें | यमराज ने कहा, तथास्तु और आगे बढ़ने लगें | सावित्री अभी भी यमराज के पीछे चल रही थी |

यमराज ने पीछा छुड़ाने के लिए सत्यवान के जीवन के अलावा दूसरा वर मांगने को कहा तो सावित्री ने अपने ससुर से छीन गया गया राज्य वापस मिल जाने का वर माँगा | यमराज ने कहा, तथास्तु और आगे बढ़ चले | सावित्री अभी भी उनके पीछे – पीछे चल रही थी | एक बार फिर यमराज ने उससे सत्यवान के प्राण के अतिरिक्त वर मांगने को कहा | सावित्री ने इस बार अपने पिता के सौ पुत्र होने की कामना की |

यमराज ने कहा, तथास्तु और आगे बढे | लेकिन सावित्री ने पीछा न छोड़ा | यमराज ने पुन: कहा कि सत्यवान की आत्मा को छोड़कर कोई भी अन्य चीज मांग लो |

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सावित्री ने कहा, महाराज ! मुझे न तो सुख की इच्छा है न ही तुच्छ जीवन की इच्छा है और न ही किसी अन्य  वस्तु की | मेरी आप से केवल एक ही प्रार्थना है कि सत्यवान से मुझें सौ पुत्र की प्राप्ति हो | सावित्री ने यमराज के मन में अपने वचन से दया और करुणा का भाव उत्पन्न कर दिया और उन्होंने सत्यवान की आत्मा को छोड़ दिया |

इस प्रकार सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राणों को बचा लिया |

वट सावित्री व्रत का महत्त्व

हिन्दू धर्म अनुआयियों में वट सावित्री व्रत का विशिष्ट महत्व माना गया है | ऐसी मान्यता है कि वट वृक्ष की पूजा करने और सावित्री – सत्यवान की कथा सुनने से सभी मनोकामना की पूर्ति होती है |

वट वृक्ष की पूजा का महत्व : शास्त्रानुसार वट वृक्ष पर व्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है | वट वृक्ष की जड़ में व्रह्मा, धड में विष्णु और ऊपरी भाग में महेश का वास होता है | जो स्त्री वट सावित्री व्रत के दिन वट वृक्ष की पूजा करती है उसकी सभी मनोकामना पूरी होती है |

देवताओं का वास होने के साथ – साथ वट वृक्ष अपनी विशालता और दीर्घायु के लिए भी लोक में प्रसिद्द है | इसलिए भी महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर अपने पति की दीर्घायु की मंगल कामना करती है |

सावित्री और सत्यवान की कथा सुनने का महत्व / महात्म्य : वट सावित्री व्रत के दिन सावित्री और सत्यवान की कथा सुनने का महात्म्य है | ऐसी मान्यता है कि जो स्त्री वट सावित्री व्रत को रखती है और सावित्री और सत्यवान की कथा सुनती है उसका सुहाग अमर हो जाता है |

अपने महत्व के कारण ही हिन्दू धर्म में हर सौभाग्यशाली स्त्री वट सावित्री व्रत के दिन पुरे दिन का उपवास रखने के संकल्प के साथ पूजा करती है और सावत्री – सत्यवान की कथा सुनती है |

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