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स्वामी विवेकानंद के प्रेरणादायक प्रेरक प्रसंग एवं कहानियाँ – Best Motivational Stories in Hindi

स्वामी विवेकानंद के बचपन के बारे में कुछ रोचक बातें एवं प्रेरक प्रसंग  

Swami Vivekananda ke Prerak Prasang Kahaniya
Swami Vivekananda ke Prerak Prasang Kahaniya

Swami Vivekananda ke Prerak Prasang – स्वामी विवेकानंद के किस्से और कहानियों को लेकर यह आर्टिकल उस विराट पुरुष को समर्पित है। स्वामी विवेकानंद एक पूर्व हिन्दू संयासी हैं, जो अपने बहुमुल्य विचारों और अद्भुत कार्यों के बल पर वर्षों से विशाल भारत की समग्र पहचान हैं। आपको जानकर बहुत हैरानी होगी कि चिंतक और साधक के रूप में ख्याति प्राप्त करने वाले स्वामी विवेकानंद अपने छोटी उम्र में ही कई कहानियों और किस्से से जुड़ गए थे।

अपने अल्प जीवन में उन्होंने अनेक कार्य किये जो आज भी उनकी किस्सों और कहानियाँ के द्वारा लोगों को सीधे प्रेरित करती है। इस सन्यासी की बचपन के कुछ रोचक तथ्य और प्रेरक प्रसंग तो काफी प्रेरणादायक और इंटरेस्टिंग है। यहाँ प्रस्तुत स्वामी विवेकानंद के बेहद उम्दा 5 छोटे प्रेरक प्रसंग भी बच्चों, युवा और प्रौढ़ो में सामान रूप से प्रेरणा का स्रोत है। बच्चों को ये प्रेरक प्रसंग पढाएँ, सुनाएँ।

एक motivational ब्लॉग होने के कारण मेरा पूर्ण प्रयास रहता है कि जो भी प्रेरक प्रसंग यहाँ पर लिखा जाये वो छात्रों के लिए ज्ञान और शिक्षा का अच्छा स्रोत हो । आशा करती हूँ ये कहानियाँ आपके द्वारा सराही जाएगी।

स्वामी विवेकानंद का संक्षिप्त जीवन परिचय 

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 में मकर संक्रान्ति के दिन एक बड़े ही धनी, कुलीन और उदारता व विद्वता के लिए परिचित परिवार में हुआ था। काल संक्रमण के लिहाज से यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। स्वामी विवेकानंद की माता का नाम भुनेश्वरी देवी था और उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था। भुनेश्वरी देवी जहां एक अत्यंत बुद्धिमान और मेधावी महिला थी वहीं उनके पिता विश्वनाथ दत्त  एक विचारक, अति उदार, गरीबों के प्रति सहानुभूति रखनेवाले, धार्मिक व सामाजिक विषयों में व्यावहारिक और रचनात्मक दृष्टिकोण रखनेवाले व्यक्ति थे । विश्वनाथ दत्त कोलकाता के उच्च न्यायालय में अटॉर्नी – एट – लॉ के पद पर रहकर बहुत दिनों तक देश की सेवा की थे।  

स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र था। घर के लोग प्यार से उन्हें ‘नरेन’ और बिले नाम से  पुकारते थे। बचपन से ही नरेन्द्रनाथ दत्त में एक बहुत उत्साही और तेजस्वी बालक के लक्षण थे और जिसे संगीत, खेलकूद और मैदानी गतिविधियों में अत्यधिक रुचि थी। साथ ही आध्यात्मिक बातों में भी उनकी रूचि थी । यह खेल – खेल में राम, सीता, शिव आदि मूर्तियों की पूजा करने में रम जाते थे। उनकी माँ उन्हें हमेशा रामायण व महाभारत की कहानियां सुनाती थी जिसे नरेन्द्रनाथ खूब चाव से सुनते थे। नरेन से विवेकानंद तक का उनका सफ़र लाजबाब है।

स्वामी विवेकानंद के जीवन के कुछ बेहद रोचक और मजेदार तथ्य

नटखट और तेज बुद्धि के स्वामी नरेन्द्रनाथ बचपन से ही सभी बातों का संतोषजनक हल मांगने लगे थे। एक बार एक बृद्ध ने नरेन्द्रनाथ से कहा, “ये जो पेड़ है सामने दिख रहा है इस पर कभी चढ़ना मत नहीं तो इस पेड़ पर जो भूत बैठा रहता है वह तुम्हें खा जाएगा।” नरेन्द्रनाथ उस भूत को देखने के लिए पूरी शाम उस पेड़ पर बैठे रहे, बस यह देखने के लिए कि क्या सचमुच इस पेड़ पर कोई भूत रहता है।

इस घटना से आप अंदाजा लगा सकते है कि नरेन्द्रनाथ बचपन में कितने नटखट थे। पर आप को बता दे कि ये गतिविधियों में जितने नटखट थे उससे कहीं अधिक इनका हृदय  गरीबों की दशा देख कर बेचैन और उनकी मदद के लिए तत्पर हो उठता था। वे अत्यंत संवेदनशील थे। जब भी वे किसी गरीब और असहाय व्यक्ति को देखते तो उसकी मदद जरूर करते थे।

एक बार तो इन्होंने अपने नए वस्त्र गरीब को दे दिए। इसके लिए तो अपने पिता से इन्हें बहुत डांट पड़ी थी और उन्होंने इसके लिए इन्हें कमरे में भी बंद कर दिया गया था । इतना ही नहीं कमरे में बंद होने के बाद इन्हें खिड़की के बाहर एक गरीब वस्त्रहीन बच्चा दिखाई दिया । उन्होंने अपने पहने हुए वस्त्र उतारकर उस बच्चे को दे दिया ।

विवेकानंद के जीवन की एक घटना तो इनके स्वभाव से परे प्रतीत होती है। हुआ ये कि इनके किसी करीबी ने पिता – पुत्र के सम्बन्ध को लेकर नरेन्द्रनाथ को उकसा दिया। वह अपने पिता जी के पास गए और पूछा, मेरे लिए आपने क्या संपत्ति रखी है ? पिता ने नरेन्द्रनाथ को दर्पण के सामने ले जाकर कहा “तुम स्वयं को देखो, सुगठित शरीर, तेजस्वी आँखें, निडर मन और पैनी बुद्धि – क्या यह सब मेरी दी हुई संपत्ति नहीं है ?”

पिता के सानिद्य में नरेन्द्रनाथ को बहुत अच्छे संस्कार मिले। जैसे – जैसे नरेन्द्रनाथ की आयु बढती गई वैसे वैसे उनके हृदय में करुणा और कोमलता की भावना भी बढती गई।

तर्क करने का स्वभाव और कुशाग्र बुद्धि इनके व्यक्तित्व में शामिल था। ऐसे व्यक्तित्व वाले इंसान के मन में ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न करना स्वाभाविक था। इसी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए एक बार नरेन्द्रनाथ अनेक धार्मिक नेताओं से मिले, किन्तु इन्हें अपने प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। इस प्रकार इनकी अध्यात्मिक बेचैनी और भी बढती गई।

1881 में नरेन्द्रनाथ की भेट स्वामी रामकृष्ण से हुई जो कलकत्ता के एक मंदिर में पुजारी थे। स्वामी रामकृष्ण भारतीय विचार एवं संस्कृति में पूर्ण निष्ठा रखते थे। वे सभी धर्मों में सत्यता के अंश को मानते थे। जब नरेन्द्रनाथ ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस से पूछा क्या आपने ईश्वर को देखा है ? श्रीरामकृष्ण ने उत्तर दिया, हाँ मैंने उसे वैसे ही देखा है जैसे मैं यहाँ तुम्हेँ देख रहा हूँ।

रामकृष्ण परमहंस स्वामी विवेकानंद से बहुत प्रभावित हुए और इन्हें अपना शिष्य बना लिया । स्वामी रामकृष्ण परमहंस ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने नरेन्द्रनाथ को आश्वश्त किया कि ईश्वर का अस्तित्व है ।

रामकृष्ण के शिक्षाओं का प्रचार – प्रसार का श्रेय भी उनके योग्य शिष्य स्वामी विवेकानन्द को मिला । स्वामी विवेकानंद के रामकृष्ण आन्दोलन के मुख्य प्रेरक स्वामी रामकृष्ण परमहंस थे । इसके बाद विवेकानंदजी जी ने सारे भारत का भ्रमण किया । सं. रा. अमेरिका जाने के पूर्व महाराज खेतड़ी के सुझाव पर नरेन्द्र नाथ ने अपना नाम ‘स्वामी विवेकानंद’ रख लिया |

शिकागो सर्वधर्म सम्मेलन

31 मई सन 1893 में विवेकानंद बम्बई से चलकर अमेरिका पहुंचे । वहां पहुंच कर उन्हें अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा । जब Swami Vivekananda जी शिकागो पहुचे तो उनसे उस समिति का पता ही खो गया, जो वहाँ आने वाले प्रतिनिधियों का स्वागत व व्यवस्था कर रहे थे । तब स्वामी जी को पूरी रात स्टेशन पर माल यार्ड में पड़े एक बक्से में गुजारना पड़ा था । समस्या बस यही नहीं खत्म हुई । प्रातःकाल उठकर स्वामी जी इस उद्देश्य से निकले कि शायद किसी से मदद मिल जाए । परन्तु काले गोरे के भेदभाव ने उनका पीछा नहीं छोड़ा । जब उन्होंने किसी से मदद लेनी चाही तो उन्हें नीग्रो, काला कुत्ता जैसे अपमानजनक शब्दों का सामना करना पड़ा । कितने लोगों ने तो उनके मुह पर दरवाजे तक बंद कर लिए ।

एक वृद्ध महिला की सहायता से हारवर्ड विश्वविद्यालय में यूनानी विभाग के प्रोफेसर जे. एच. राईट से उनकी मुलाकात हुई । राईट विवेकानंद से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने मित्र डॉ. बरोज , जो की सर्व धर्म सम्मलेन के अध्यक्ष थे, को लिखा कि

“यहां पर एक अज्ञात ऐसा हिन्दू संन्यासी है जो हमारे सभी विद्वान पंडितों को एकत्रित करने पर जो कुछ हो सकता है उससे भी अधिक विद्वान है ।”

स्वामी विवेकानंद को केवल अपनी योग्यता, विद्वता और वक्तृत्व शक्ति के सहारे जब उस विश्व धर्म सम्मेलन में प्रवेश मिला तब वो सहसा ही सबके आकर्षण का केंद्र बन गये और 11 सितम्बर 1893 को अपने पहले भाषण में ही सबको प्रभावित कर लिया । सम्मेलन में सबकी आँखें उनपर लगी रहती थी । सब उनका भाषण सुनने  के लिए इतने आतुर रहते थे कि सम्मेलन के अध्यक्ष उपस्थिति बनाये रखने के लिए विवेकानंद को सबके बाद समय देते थे और बीच – बीच में उनके भाषण की सूचना देते रहते थे ।

सर्व धर्म सम्मेलन में विवेकानंद की उपस्थिति का सारे अमेरिका पर अद्भुत प्रभाव पड़ा । जगह – जगह से इन्हें निमंत्रण प्राप्त होने लगे । उनके व्याख्यानों का ऐसा प्रभाव पड़ा कि अनेक व्यक्ति उनके शिष्य बन गये । उनकी ख्याति बहुत बढ़ गई थी । इन्होंने शीकागो धर्म संसद में भाग लेकर पाश्चात्य जगत को भारतीय संस्कृत एवं दर्शन से अवगत कराया ।

धर्म संसद में स्वामी जी ने अपने भाषण में भौतिकवाद एवं अध्यात्मवाद के मध्य संतुलन बनाने की बात कही । विवेकानंद ने पूरे संसार के लिए एक ऐसी संस्कृति की कल्पना की जो पश्चिमी देशों के भौतिकवाद एवं पूर्वी देशों के अध्यात्मवाद के मध्य संतुलन बनाने की बात कर सके तथा संपूर्ण विश्व को खुशियाँ प्रदान कर सके । वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पश्चिम की भौतिकवादी जनता के सम्मुख भारत के आध्यात्मवाद का महान और पुरातन आदर्श उपस्थित करके अपने देश की वास्तविक चिंतनधारा का चित्र प्रस्तुत किया और कुप्रथाओं व अंधविश्वासों को दूर करने के लिए आवाज उठाई ।

स्वामी विवेकानंद ने 1896 ई. में न्यूयार्क में “वेदान्त सोसाइटी” का गठन किया । अपनी दो पत्रिकाओं (१) प्रबुद्ध भारत (अंग्रेजी में ) और (२) उद्बोधन (बंगाली में ) के माध्यम से उन्होंने अपने विचारों को प्रचारित किया ।

1897 में पश्चिम देशों को अपने व्यक्तित्व और वेदांत दर्शन से प्रभावित करने के बाद विवेकानंद भारत लौट आये । यहाँ आकर इन्होंने “रामकृष्ण मिशन” की स्थापना की ।

अब तक स्वामी विवेकानंद जी की ख्याति इतनी बढ़ चुकी थी कि उनकी एक झलक देखने के लिए लोग आतुर रहते थे । जब स्वामी विवेकानंदजी मद्रास जा रहे थे । एक छोटे से रेलवे स्टेशन पर एक अद्भुत नाटकीय घटना घटी । दरअसल उस छोटे से स्टेशन पर कभी कोई ट्रेन नहीं रूकती थी, पर लोगों की भीड़, स्टेशन मास्टर से बार – बार अनुरोध कर रही थी कि गाड़ी कुछ देर के लिए रोक दे । लेकिन स्टेशन मास्टर नहीं तैयार हुए । तभी भीड़ से कुछ लोग निकलकर पटरी पर जाकर लेट गए । उसी समय ट्रेन भी आ गई । ट्रेन के ड्राइवर को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करें ? किसी तरह से उसने ट्रेन रोकी । स्वामी विवेकानंदजी जी गाड़ी के दरवाजे पर आये और सबका अभिवादन स्वीकार किया । Swami Vivekananda जी के क्षणिक झलक से लोग भाव विभोर हो गए और पूरा स्टेशन  स्वामी जी और भारत माता के जयकार से गूंज उठा ।

स्वामी जी हमेशा सबका भला चाहते थे । उन्होंने ऐसे धर्म में अपनी आस्था को नाकारा जो किसी विधवा के आंसू नहीं पोंछ सकता व किसी अनाथ को रोटी नहीं दे सकता । स्वामी जी ने एक समाज सुधारक के रूप में यह माना कि ईश्वर प्राप्ति तथा मुक्ति के अनेक रास्ते है और मानव की सेवा ईश्वर की सेवा है क्योंकि मानव ईश्वर का ही रूप है ।

स्वामी जी कहते थे “हम मानवता को वहां ले जाना चाहते हैं जहाँ न वेद है, न बाइबिल और न कुरान, लेकिन यह काम वेद, बाइबिल और कुरान के समन्वय द्वारा किया जाता है । मानवता को सीख देनी है कि सभी धर्म उस अद्वितीय धर्म की ही विभिन्न अभिव्यक्तियाँ है जो एकत्व है । सभी को छूट है कि उन्हें जो मार्ग अनुकूल लगें उन्हें चुन ले ।”

भारतीय धर्म के पतन के बारे स्वामी जी ने कहा है कि “हमारे धर्म रसोईघर में हैं । हमारे भगवान खाना बनाने के बर्तनों में हैं ।”

रामकृष्ण मिशन के कार्यों की व्यस्तता के कारण स्वमी विवेकानंद को दमा और मधुमेह की बीमारी हो गई थी । अंत में 4 जुलाई 1902 ई. को केवल 39 वर्ष और कुछ महीनों की अवस्था में उनका देहावसान हो गया ।

स्वामी विवेकानंद के बारे में सुभाषचंद्र बोस का कहना था, “जहां तक बंगाल का सम्बन्ध है हम विवेकानंद को आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन का अध्यात्मिक पिता कह सकते हैं ।”

12 जनवरी 1863 ई. को जन्मी दिव्य चेतना ने जो देह धारण की थी वह आज नहीं है पर उनकी चेतनता आज भी उतनी ही प्रखर एवं तेजस्वी है । वह अपने विचारों के रूप में उपस्थित रहकर आज भी और अभी भी भारत देश के युवाओं को प्रेरित, परिवर्तित एवं रूपांतरित करने के लिए व्याकुल हैं । स्वामी जी की चेतना ने सदा ही भारत देश के युवाओं के हृदय में बोध के तार झंकृत किए हैं ।

श्री अरविन्द घोष, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू ये सभी अपनी युवा अवस्था में स्वामी जी की वैचारिक अध्यात्मिक चेतना से प्रेरित – प्रभावित रहे हैं और आज भी प्रत्येक आदर्शनिष्ठ युवा के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानंद जी है ।

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Babita Singh
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