Kabir Ke Dohe
Hindi Post Hindi Quotes Kavita विविध

कबीर दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित – Kabir Ke Dohe With Meaning

 भक्त कवि : कबीरदास के दोहे – Sant Kabir Das Ke Dohe in Hindi

Kabir Ke Dohe – कबीर हिंदी साहित्य के निर्गुण भक्ति ज्ञानाश्रयी शाखा के अत्यंत प्रसिद्ध कवि थे। भक्त कवियों में कबीर का स्थान आकाश नक्षत्र के समान है। हिन्दी साहित्य जगत के हजार वर्षों के इतिहास में जब जब अत्यंत प्रसिद्द रचनाओं या दोहों को स्मृति पटल पर याद किया गया तो उनमें संत कबीर दास की रचनाओं और दोहों का नाम सर्वप्रथम आया और आज भी उनकी बातें समीचीन हैं। उनके कहें पद व दोहा को लोग बड़े शौक से सुना करते हैं। कहते है कि कबीर के दोहे में उनका ह्रदय नहीं, बल्कि उनका मस्तिष्क बोलता था।

जरुर पढ़े : रहीम दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित

कबीर के चिरस्थायी दोहे ने सदियों पूर्व सभी धर्मों, सम्प्रदायों और जातियों के चल रहें व्यवहार को चुनौती दी और उनके वे दोहे आज भी प्रासंगिक है तथा मानव सभ्यता के रहने तक सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने में अत्यधिक महत्वपूर्ण योगदान देते रहेंगे।

यहाँ इस लेख में कबीर के लोकप्रिय दोहें व साखियों का सरल, सुगम भाषा शैली में अनूठा संकलन सुलभ करा रही हूँ जो ज्ञान, नीति, उपदेश, व्यवहार, धर्म अध्यात्म व अमृतवचनों से भरपूर हैं।

कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित, Kabir Ke Dohe in Hindi

Kabir ke Dohe in hindi
Kabir ke Dohe in hindi

संत कबीर के दोहे अर्थ सहित (Kabir Ke Dohe With Meaning Hindi Language)

*************************************************************************************************************

दोहा -कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस।

ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस।।

अर्थ : कबीर कहते हैं कि हे मानव ! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है। मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले।

*************************************************************************************************************

दोहा – “ पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।”

अर्थ – बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर इस जग में न जाने कितने लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी प्रकार से पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

*************************************************************************************************************

दोहा – “ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोय। 

अर्थ – कबीर कहते है जब मैं इस संसार में बुराई खोजने निकला तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला परन्तु जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि इस संसार में मुझ से बुरा कोई नहीं है ।

*************************************************************************************************************

दोहा -जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई।

जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।।

अर्थ : कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला ग्राहक मिल जाता है तो; गुण की कीमत होती है। पर जब ऐसा ग्राहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है।

*************************************************************************************************************

दोहा – “तू – तू करु तो निकट है, दूर – दूर करु हो जाय,

ज्यौं गुरु राखै त्यों रहै, जो देवै सो खाय |”

अर्थ –  तू – तू करके बुलावे तो निकट जाय, यदि दूर – दूर करके दूर करे तो दूर जाय । गुर और स्वामी जैसे रखे उसी प्रकार रहे, जो देवें वही खाय । कबीर कहते है कि यही अच्छे सेवक के आचरण होने चाहिए ।

*************************************************************************************************************

दोहा – “निरमल गुरु के नाम सों , निरमल साधू भाय,

कोइला होय न ऊजला , सौ मन साबुन लाय |”

अर्थ – सत्गुरू के सत्य – ज्ञान से निर्मल मनवाले लोग भी सत्य – ज्ञानी हो जाते हैं, लेकिन कोयले की तरह काले मनवाले लोग मन भर साबुन मलने पर भी उजले नहीं हो सकते – अर्थात उन पर विवेक और बुद्धि की बातों का कोई असर नहीं पड़ता ।

*************************************************************************************************************

Loading...

दोहा -कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।

बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।।

अर्थ :कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए. बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है. इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।

*************************************************************************************************************

दोहा -कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,

ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।

अर्थ : इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो !

*************************************************************************************************************

दोहा -दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,

तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ : इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता ;झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता।

*************************************************************************************************************

दोहा – “कल करे सो आज कर, आज करे सो अब,

पल में प्रलय  होएगी, बहुरि करेगा कब |”

अर्थ – कल के सारे काम आज कर लें, और आज के काम अभी खत्म कर लें, समय का कोई भरोसा नहीं, पता नहीं कब प्रलय हो जाये। इसलिए शुभ काम को कल पर कभी मत टालिए, उनको जीवन ख़त्म होने से पहले कर लीजिये ।

*************************************************************************************************************

दोहा – “दीपक सुन्दर देख करि, जरि जरि मरे पतंग,

बढ़ी लहर जो विषय की, जरत न मोरें अंग |”

अर्थ – जिस प्रकार दीपक की सुनहरी और लहराती लौ की ओर आकर्षित होकर कीट – पतंगे उसमें जल मरते हैं उसी प्रकार जो कामी लोग होते है वो विषय – वासना की तेज लहर में बहकर ये तक भूल जाते है कि वे डूब मरेंगे ।

*************************************************************************************************************

दोहा -कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।

कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।।

अर्थ : कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया। कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता। आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है।

*************************************************************************************************************

दोहा -हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,

आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।।

अर्थ : कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है। इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।

*************************************************************************************************************

दोहा – “बन्दे तू कर बंदगी, तो पावै दीदार,

औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार |”

अर्थ – हे सेवक ! तू सद्गुरु की सेवा कर क्योंकि सेवा के बिना उसका स्वरूप – साक्षात्कार नहीं हो सकता है । तुझे इस मनुष्य जन्म का उत्तम अवसर बारम्बार न मिलेगा ।

*************************************************************************************************************

दोहा – जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ : जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।

*************************************************************************************************************

दोहा – दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,

अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

अर्थ : यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत।

*************************************************************************************************************

Loading...

दोहा – जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ : सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए. तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का।

*************************************************************************************************************

दोहा – लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट।

पाछे पछतायेगा, जब प्राण जायेंगे छूट।।

अर्थ – बिना किसी कीमत के आपके पास राम के नाम तक पहुंच है। फिर क्यों आप जितना संभव हो, उतना नहीं पहुंच सकते। कही ऐसा न हो, आपके जीवन के आखिरी पल में आपको खेद हो।

*************************************************************************************************************

दोहा – कस्तूरी कुंडल बसे; मृग ढूँढत बन माहि।

ज्यो घट घट राम है; दुनिया देखे नाही।।

अर्थ – एक हिरण स्वयं में सुगंधित होता है, और इसे खोजने के लिए पूरे वन में चलता है। इसी प्रकार राम हर जगह है लेकिन दुनिया नहीं देखती है। उसे अपने अंतर्मन में ईश्वर को खोजना चाहिए और जब वह एक बार भीतर के ईश्वर को पा लेगा तो उसका जीवन आनन्द से भर उठेगा ।

*************************************************************************************************************

दोहा – जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग।

तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग।।

अर्थ – जैसे तिल के बीज में तेल होता है और चकमक पत्थर में आग। ठीक उसी तरह ईश्वर बीज के समान आपके भीतर है और तूम प्रार्थना स्थलों पर ढूँढते हो |

*************************************************************************************************************

दोहा – चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाए।

वैद बेचारा क्या करे, कहा तक दवा लगाए।।

अर्थ – कबीर का यह दोहा प्रत्येक इंसान की हालत बताता है | कबीर कहते है “चिंता इतनी चोर है कि यह किसी के भी दिल को खा जाती है। कोई डॉक्टर भला क्या कर सकता है ? उसकी दवा कितनी दूर तक मदद कर पायेगी ??

*************************************************************************************************************

दोहा – निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

अर्थ : जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है।

*************************************************************************************************************

दोहा – अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ : न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है. जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।

*************************************************************************************************************

दोहा – बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।

हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

अर्थ : यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।

*************************************************************************************************************

दोहा – संसारी से प्रीतड़ी , सरै न एकी काम,

    दुविधा में दोनों गए , माया मिली न राम |”

अर्थ – संसारी लोगों से प्रेम और मेल – जोल बढ़ाने से एक भी काम अच्छा नहीं होता, बल्कि दुविधा या भ्रम की स्थिति बन जाती है, जिसमें न तो भौतिक संपत्ति हासिल होती है, न अध्यात्मिक । दोनों ही हाथ खाली रह जाते है ।

*************************************************************************************************************

Kabir Ke Dohe in Hindi
Kabir Ke Dohe in Hindi

*************************************************************************************************************

दोहा – सुख के संगी स्वारथी , दुःख में रहते दूर,

कहैं कबीर परमारथी , दुःख सुख सदा हजूर |”

अर्थ – स्वार्थी लोग मात्र सुख के साथी होते हैं । जब दुःख आता है तो भाग खड़े होने में क्षणिक विलम्ब नहीं करते हैं और जो सच्चे परमार्थी होते हैं वे दुःख हो या सुख सदा साथ होते हैं ।

Loading...

*************************************************************************************************************

दोहा – भय से भक्ति करै सबै , भय से पूजा होय,

भय पारस है जीव को , निरभय होय न कोय |”

अर्थ – सांसारिक भय के कारण ही लोग भक्ति और पूजा करते है । इस प्रकार भय जीव के लिए पारस के समान है, जो इसे भक्तिमार्ग में लगाकर उसका कल्याण करता है । इसलिए सन्मार्ग पर चलने के लिए जरुरी है कि सभी भीरु हों ।

*************************************************************************************************************

दोहा – यह बिरियाँ तो फिरि नहीं, मन में देखु विचार,

आया लाभहि कारनै, जनम जुआ मत हार |”

अर्थ – हे दास ! सुन, मनुष्य जीवन बार – बार नहीं मिलता, इसलिए सोच – विचार कर ले कि तू लाभ के लिए अर्थात मुक्ति के लिए आया है । इस अनमोल जीवन को तू सांसारिक जुए में मत हार ।

*************************************************************************************************************

दोहा – झूठा सब संसार है, कोउ न अपना मीत |

राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत ||

अर्थ – हे मनुष्य ! ये संसार झूठा और असार है जहाँ कोई अपना मित्र और सम्बंधी नहीं है । इसलिए तू राम – नाम के सच्चाई को जान ले तो ही इस भवसागर से मुक्ति मिल जाएगी ।

*************************************************************************************************************

दोहा – बडा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।

पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

अर्थ – सिर्फ बड़े होने से कुछ नहीं होता । बड़ा तो खजूर का पेड़ भी होता है लेकिन ना तो ये किसी यात्री को धूप के समय छाया दे सकता है, ना ही इसके फल कोई आसानी से तोड़ के अपनी भूख मिटा सकता है ।

*************************************************************************************************************

दोहा –कबीरा खड़ा बाज़ार में, सबकी मांगे खैर |

ना काहू से दोस्ती,  ना काहू से बैर ||

अर्थ –  विरोध, कटुता, तनाव और टकराव को भुलाकर सबके बारे में भला सोच । ना तू किसी से ज्यादा दोस्ती रख और ना ही किसी से दुश्मनी ।

*************************************************************************************************************

दोहा – “कहे कबीर कैसे निबाहे , केर बेर को संग,

वह झूमत रस आपनी, उसके फाटत अंग |

अर्थ जैसे केले और बेर का पेड़ साथ साथ नहीं लगा सकते क्योंकि हवा से बेर का पेड़ हिलेगा और उसके काँटों से केले के पत्ते कट जायेंगे उसी प्रकार भिन्न प्रकृति के लोग एक साथ नहीं रह सकते ।

*************************************************************************************************************

दोहा – “सुख मे सुमिरन ना किया,  दु:ख में करते याद,

कह कबीर ता दास की, तो कौन सुने फरियाद |”

अर्थ – हे दास ! जब तूने अपने अच्छे समय में भगवान का सुमिरन नहीं किया है और अब तू उसे बुरे समय में याद कर रहा हैं तो फिर कौन तेरा रोना सुनेगा ।

*************************************************************************************************************

दोहा – “साई इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाए,

मैं भी भूखा ना रहू, साधु भूखा ना जाए |”

अर्थ –  कबीरदास भोगवाद के कट्टर विरोधी थे । वे अनावश्यक संग्रह के भी कटु आलोचक थे और केवल उतने ही उपभोग के पक्षधर थे जितने से जीवन – यापन हो सके इसलिए वे कह उठे थे भगवान, मुझे बहुत ज्यादा नहीं देते, लेकिन मेरे परिवार की देखभाल करने के लिए पर्याप्त है, और मेरे पास आने वाले लोग खाली पेट नहीं जाना चाहिए ।

*************************************************************************************************************

दोहा – रात गवाई सोए के, दिवस गवाया खाय,

हीरा जनम अनमोल था कोड़ी बदले जाए |”

अर्थ अपना पूरा जीवन केवल सोते और खाने में ही बर्बाद कर देने वाले हे मनुष्य तू याद रख  कि भगवान ने यह अनमोल जन्म ऊंचाइयों को हासिल करने के लिए दिया है, ना कि इसे बेकार करने के लिए ।”

*************************************************************************************************************

दोहा – “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय,

औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय |”

अर्थ – मान और अहंकार का त्याग करके ऐसी वाणी में बात करें कि औरों के साथ – साथ स्वयं को भी खुशी मिले | कबीर कहते है केवल मीठी वाणी से ही दिल जीते जाते है ।

*************************************************************************************************************

दोहा – “गुरु गोविंद दोनो खड़े, काके लागू पाए,

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद डियो बताए |”

अर्थ – शिक्षक और प्रभु दोनों ही हैं, जिन्हें पूजा करना चाहिए। लेकिन शिक्षक आप महान हैं, क्योंकि आपकी शिक्षा के कारण ही भगवान् के दर्शन हुए हैं ।

*************************************************************************************************************

दोहा – “माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय,

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय |”

अर्थ – मिटटी कुम्हार से कहती है कि आज तो तू मुझे पैरों के नीचे रोंद रहा है पर एक दिन ऐसा आएगा जब तू मेरे नीचे होगा और मैं तेरे ऊपर होउंगी अर्थात मृत्यु के बाद सब मिटटी के नीचे ही होते हैं ।

*************************************************************************************************************

दोहा – माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ – ये उन लोगों के ऊपर कटाक्ष है जो धर्मभीरु होते हैं. कबीर की ऐसे लोगों के लिए सलाह है कि हाथ में लेकर मोती की माला फेरने से कुछ नहीं होता, उससे मन का भाव नहीं बदलता, मन की हलचल भी शांत नहीं होती। असल में व्यक्ति को मन का मैल साफ़ करना होगा। हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर, सबसे पहले मन का मैल साफ करो। अपने मन में शुद्ध विचार भरो। धर्मभीरुता छोड़ के अपने मन को बदल ।

*************************************************************************************************************

Kabir Ke Dohe in Hindi
Kabir Ke Dohe in Hindi

*************************************************************************************************************

दोहा – “बार – बार तोसों कहा, रे मनुवा नीच,

बनजारे का बैल ज्यों, पैडा माही मीच |”

अर्थ – हे नीच मनुष्य ! सुन, तुझसे मैं बारम्बार कहता रहा हूँ । जैसे एक व्यापारी का बैल बीच मार्ग में प्राण गवा देता है वैसे तू भी अचानक एक दिन मर जाएगा ।

*************************************************************************************************************

दोहा – माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ : कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती. कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।

*************************************************************************************************************

दोहा – धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ : मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है. अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा !

*************************************************************************************************************

दोहा – तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ : कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है. यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !

*************************************************************************************************************

दोहा – “धीरे -धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय |”

अर्थ – धीर धरने वाले को ही सब कुछ मिलता है । जैसे किसी पेड़ को माली द्वारा रोजाना सौ घड़े पानी सींचने पर भी फल तो ऋतु के आने पर ही मिलता है ।

*************************************************************************************************************

दोहा – पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात।

एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात।

अर्थ : कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है। जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी।

*************************************************************************************************************

दोहा – साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ : इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे।

*************************************************************************************************************

दोहा – पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

*************************************************************************************************************

दोहा – बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ : जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

*************************************************************************************************************

दोहा – “पाहन केरी पूतरी, करि पूजै संसार,

याहि भरोसें मत रहो, बूडो काली धार |”

अर्थ – पत्थर की मूर्ति बनाकर, संसार के लोग पूजते हैं । परन्तु इसके भरोसे मत रहो, अन्यथा कल्पना के अंधकार कुँए में, अपने को डूबे – डुबाए समझों ।

*************************************************************************************************************

दोहा – “पाहन पूजै हरि मिलै, तो मैं पूजूँ पहार,

ताते तो चक्की भली, पीसि खाय संसार |”

अर्थ – यदि पत्थर के पूजने से ज्ञान या कल्याण की प्राप्ति हो, तो मैं पर्वत को पूजने पर डट जाऊं । मूर्ति पूजने से तो चक्की पूजना अच्छा है, जिससे आटा पीसकर संसार खाता है ।

*************************************************************************************************************

दोहा – “न्हाए धोए क्या भया, जो मन मैला न जाय,

मीन सदा जल में रहै, धोए बास न जाय |”

अर्थ – पवित्र नदियों में शारीरिक मैल धो लेने से कल्याण नहीं होता | इसके लिए भक्ति – साधना से मल का मैल साफ करना पड़ता है | जैसे मछली हमेशा जल में रहती है, लेकिन इतना धुलकर भी उसकी दुर्गंध समाप्त नहीं होती ।

*************************************************************************************************************

दोहा – मन मक्का दिल द्वारिका, काया काशी जान,

दश द्वारे का देहरा, तामें ज्योति पिछान |”

हिंदी अर्थ – कबीर कहते है पवित्र मन ही मक्का और दिल ही द्वारिका है और काया को ही काशी जानो । दस – द्वारों के शरीर – मंदिर में ज्ञान प्रकाशमय स्व – स्वरूप चेतन को ही सत्य देवता समझों ।

*************************************************************************************************************

Friends कबीर ने सदियों पूर्व अपने मौखिक दोहों के द्वरा जो शिक्षा, उपदेश और सन्देश दीए वे व्यर्थ नहीं गए । उनके पदचिन्हों पर चलकर अनेक साधारण लोग महान बने और यक़ीनन आप को भी इन दोहों से लाभ प्राप्त हुआ होगा । तो देर किस बार की Kabir Das Ke Dohe को शेयर करे और हाँ हमारे Facebook Page जरुर like करे तथा free email subscription जरुर ले ताकि मैं अपने future posts सीधे आपके inbox में भेज सकूं ।

Loading...
Copy

3 thoughts on “कबीर दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित – Kabir Ke Dohe With Meaning”

  1. Kabir’s quotes are the best of all.If a person leads his life according to kabirs quotes then his life becomes heaven. He has to face no trobles in his life and always lead a happy and satisfied life. He will have no extraordinary wishes and be satisfied with what he has and he becomes a perfect man. Thank You.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *